गीता · जीवन का उद्देश्य
कुंडलीपंचांग

जीवन का उद्देश्य पर गीता क्या कहती है?

पहचान, अर्थ, दिशा

“मैं कौन हूँ, किसलिए हूँ?” — गीता जीव को परमात्मा का सनातन अंश बताती है (15.7), और कहती है कि यह जान लेने पर मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है (15.20)।

10श्लोक
7अध्याय से
गीता 15.7 श्रीकृष्ण

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

हिंदी अर्थइस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

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mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ
manaḥ-ṣhaṣhṭhānīndriyāṇi prakṛiti-sthāni karṣhati

अध्याय 15 · पुरुषोत्तमयोग
गीता 2.17 श्रीकृष्ण

अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम्।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित् कर्तुमर्हति ॥

हिंदी अर्थअविनाशी तो उसको जान, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है। इस अविनाशीका विनाश कोई भी नहीं कर सकता।

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avināśhi tu tadviddhi yena sarvam idaṁ tatam
vināśham avyayasyāsya na kaśhchit kartum arhati

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 13.22 श्रीकृष्ण

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ॥

हिंदी अर्थयह पुरुष प्रकृति-(शरीर-) के साथ सम्बन्ध रखनेसे 'उपद्रष्टा', उसके साथ मिलकर सम्मति, अनुमति देनेसे 'अनुमन्ता', अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे 'भर्ता', उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे 'भोक्ता', और अपनेको उसका स्वामी माननेसे 'महेश्वर' बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष 'परमात्मा' कहा जाता है। यह देहमें रहता हुआ भी देहसे पर (सम्बन्ध-रहित) ही है।

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upadraṣhṭānumantā cha bhartā bhoktā maheśhvaraḥ
paramātmeti chāpy ukto dehe ’smin puruṣhaḥ paraḥ

अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
गीता 7.7 श्रीकृष्ण

मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥

हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है।

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mattaḥ parataraṁ nānyat kiñchid asti dhanañjaya
mayi sarvam idaṁ protaṁ sūtre maṇi-gaṇā iva

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 7.3 श्रीकृष्ण

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥

हिंदी अर्थहजारों मनुष्योंमें कोई एक वास्तविक सिद्धिके लिये यत्न करता है और उन यत्न करनेवाले सिद्धोंमें कोई एक ही मुझे तत्त्वसे जानता है।

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manuṣhyāṇāṁ sahasreṣhu kaśhchid yatati siddhaye
yatatām api siddhānāṁ kaśhchin māṁ vetti tattvataḥ

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 7.19 श्रीकृष्ण

बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते।
वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः ॥

हिंदी अर्थबहुत जन्मोंके अन्तमें अर्थात् मनुष्यजन्ममें 'सब कुछ परमात्मा ही है', ऐसा जो ज्ञानवान् मेरे शरण होता है, वह महात्मा अत्यन्त दुर्लभ है।

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bahūnāṁ janmanām ante jñānavān māṁ prapadyate
vāsudevaḥ sarvam iti sa mahātmā su-durlabhaḥ

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 3.16 श्रीकृष्ण

एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः।
अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति ॥

हिंदी अर्थहे पार्थ! जो मनुष्य इस लोकमें इस प्रकार परम्परासे प्रचलित सृष्टिचक्रके अनुसार नहीं चलता, वह इन्द्रियोंके द्वारा भोगोंमें रमण करनेवाला अघायु (पापमय जीवन बितानेवाला) मनुष्य संसारमें व्यर्थ ही जीता है।

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evaṁ pravartitaṁ chakraṁ nānuvartayatīha yaḥ
aghāyur indriyārāmo moghaṁ pārtha sa jīvati

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 8.15 श्रीकृष्ण

मामुपेत्य पुनर्जन्म दुःखालयमशाश्वतम्।
नाप्नुवन्ति महात्मानः संसिद्धिं परमां गताः ॥

हिंदी अर्थमहात्मालोग मुझे प्राप्त करके दुःखालय और अशाश्वत पुनर्जन्मको प्राप्त नहीं होते; क्योंकि वे परमसिद्धिको प्राप्त हो गये हैं अर्थात् उनको परम प्रेमकी प्राप्ति हो गयी है।

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mām upetya punar janma duḥkhālayam aśhāśhvatam
nāpnuvanti mahātmānaḥ sansiddhiṁ paramāṁ gatāḥ

अध्याय 8 · अक्षरब्रह्मयोग
गीता 9.33 श्रीकृष्ण

किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा।
अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम् ॥

हिंदी अर्थजो पवित्र आचरणवाले ब्राह्मण और ऋषिस्वरूप क्षत्रिय भगवान्  के भक्त हों, वे परमगतिको प्राप्त हो जायँ, इसमें तो कहना ही क्या है। इसलिये इस अनित्य और सुखरहित शरीरको प्राप्त करके तू मेरा भजन कर।

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kiṁ punar brāhmaṇāḥ puṇyā bhaktā rājarṣhayas tathā
anityam asukhaṁ lokam imaṁ prāpya bhajasva mām

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 15.20 श्रीकृष्ण

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयाऽनघ।
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ॥

हिंदी अर्थहे निष्पाप अर्जुन ! इस प्रकार यह अत्यन्त गोपनीय शास्त्र मेरे द्वारा कहा गया है। हे भरतवंशी अर्जुन ! इसको जानकर मनुष्य ज्ञानवान् (तथा प्राप्त-प्राप्तव्य) और कृतकृत्य हो जाता है।

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iti guhyatamaṁ śhāstram idam uktaṁ mayānagha
etad buddhvā buddhimān syāt kṛita-kṛityaśh cha bhārata

अध्याय 15 · पुरुषोत्तमयोग

दूसरे विषय

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हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।