गीता · असफलता
कुंडलीपंचांग

असफलता पर गीता क्या कहती है?

हार, जीत, नई कोशिश

मेहनत के बाद भी नतीजा न मिले तो मन टूटता है, और सफलता मिले तो घमंड आता है। गीता दोनों में सम रहने को कहती है, और भरोसा देती है कि अच्छे मार्ग पर किया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

19श्लोक
6अध्याय से
गीता 2.48 श्रीकृष्ण

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

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yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya
siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.38 श्रीकृष्ण

सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥

हिंदी अर्थजय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।

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sukha-duḥkhe same kṛitvā lābhālābhau jayājayau
tato yuddhāya yujyasva naivaṁ pāpam avāpsyasi

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 6.40 श्रीकृष्ण

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।

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śhrī bhagavān uvācha
pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate
na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.37 अर्जुन

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥

हिंदी अर्थहे कृष्ण ! जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है?

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arjuna uvācha
ayatiḥ śhraddhayopeto yogāch chalita-mānasaḥ
aprāpya yoga-sansiddhiṁ kāṅ gatiṁ kṛiṣhṇa gachchhati

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.38 अर्जुन

कच्चिन्नोभयविभ्रष्टश्छिन्नाभ्रमिव नश्यति।
अप्रतिष्ठो महाबाहो विमूढो ब्रह्मणः पथि ॥

हिंदी अर्थहे महाबाहो ! संसारके आश्रयसे रहित और परमात्मप्राप्तिके मार्गमें मोहित अर्थात् विचलित -- इस तरह दोनों ओरसे भ्रष्ट हुआ साधक क्या छिन्न-भिन्न बादलकी तरह नष्ट तो नहीं हो जाता ?

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kachchin nobhaya-vibhraṣhṭaśh chhinnābhram iva naśhyati
apratiṣhṭho mahā-bāho vimūḍho brahmaṇaḥ pathi

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.39 अर्जुन

एतन्मे संशयं कृष्ण छेत्तुमर्हस्यशेषतः।
त्वदन्यः संशयस्यास्य छेत्ता न ह्युपपद्यते ॥

हिंदी अर्थहे कृष्ण! मेरे इस सन्देहका सर्वथा छेदन करनेके लिये आप ही योग्य हैं; क्योंकि इस संशयका छेदन करनेवाला आपके सिवाय दूसरा कोई हो नहीं सकता।

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etan me sanśhayaṁ kṛiṣhṇa chhettum arhasyaśheṣhataḥ
tvad-anyaḥ sanśhayasyāsya chhettā na hyupapadyate

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.41 श्रीकृष्ण

प्राप्य पुण्यकृतां लोकानुषित्वा शाश्वतीः समाः।
शुचीनां श्रीमतां गेहे योगभ्रष्टोऽभिजायते ॥

हिंदी अर्थवह योगभ्रष्ट पुण्यकर्म करनेवालोंके लोकोंको प्राप्त होकर और वहाँ बहुत वर्षोंतक रहकर फिर यहाँ शुद्ध  श्रीमानोंके घरमें जन्म लेता है।

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prāpya puṇya-kṛitāṁ lokān uṣhitvā śhāśhvatīḥ samāḥ
śhuchīnāṁ śhrīmatāṁ gehe yoga-bhraṣhṭo’bhijāyate

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.42 श्रीकृष्ण

अथवा योगिनामेव कुले भवति धीमताम्।
एतद्धि दुर्लभतरं लोके जन्म यदीदृशम् ॥

हिंदी अर्थअथवा (वैराग्यवान्) योगभ्रष्ट ज्ञानवान् योगियोंके कुलमें ही जन्म लेता है। इस प्रकारका जो यह जन्म है, यह संसारमें बहुत ही दुर्लभ है।

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atha vā yoginām eva kule bhavati dhīmatām
etad dhi durlabhataraṁ loke janma yad īdṛiśham

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.43 श्रीकृष्ण

तत्र तं बुद्धिसंयोगं लभते पौर्वदेहिकम्।
यतते च ततो भूयः संसिद्धौ कुरुनन्दन ॥

हिंदी अर्थहे कुरुनन्दन ! वहाँपर उसको पूर्वजन्मकृत साधन-सम्पत्ति अनायास ही प्राप्त हो जाती है। फिर उससे वह साधनकी सिद्धिके विषयमें पुनः विशेषतासे यत्न करता है।

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tatra taṁ buddhi-sanyogaṁ labhate paurva-dehikam
yatate cha tato bhūyaḥ sansiddhau kuru-nandana

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.44 श्रीकृष्ण

पूर्वाभ्यासेन तेनैव ह्रियते ह्यवशोऽपि सः।
जिज्ञासुरपि योगस्य शब्दब्रह्मातिवर्तते ॥

हिंदी अर्थवह (श्रीमानोंके घरमें जन्म लेनेवाला योगभ्रष्ट मनुष्य) भोगोंके परवश होता हुआ भी पूर्वजन्ममें किये हुए अभ्यास-(साधन-) के कारण ही परमात्माकी तरफ खिंच जाता है; क्योंकि योग-(समता-) का जिज्ञासु भी वेदोंमें कहे हुए सकाम कर्मोंका अतिक्रमण कर जाता है।

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pūrvābhyāsena tenaiva hriyate hyavaśho ’pi saḥ
jijñāsur api yogasya śhabda-brahmātivartate

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.45 श्रीकृष्ण

प्रयत्नाद्यतमानस्तु योगी संशुद्धकिल्बिषः।
अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ॥

हिंदी अर्थपरन्तु जो योगी प्रयत्नपूर्वक यत्न करता है और जिसके पाप नष्ट हो गये हैं तथा जो अनेक जन्मोंसे सिद्ध हुआ है, वह योगी फिर परमगतिको प्राप्त हो जाता है।

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prayatnād yatamānas tu yogī sanśhuddha-kilbiṣhaḥ
aneka-janma-sansiddhas tato yāti parāṁ gatim

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 2.15 श्रीकृष्ण

यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते ॥

हिंदी अर्थकारण कि हे पुरुषोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! सुख-दुःखमें सम रहनेवाले जिस धीर मनुष्यको ये मात्रास्पर्श (पदार्थ) व्यथित (सुखी-दुःखी) नहीं कर पाते, वह अमर होनेमें समर्थ हो जाता है अर्थात् वह अमर हो जाता है।

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yaṁ hi na vyathayantyete puruṣhaṁ puruṣharṣhabha
sama-duḥkha-sukhaṁ dhīraṁ so ’mṛitatvāya kalpate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.57 श्रीकृष्ण

यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम्।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

हिंदी अर्थसब जगह आसक्तिरहित हुआ जो मनुष्य उस-उस शुभ-अशुभको प्राप्त करके न तो अभिनन्दित होता है और न द्वेष करता है, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

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yaḥ sarvatrānabhisnehas tat tat prāpya śhubhāśhubham
nābhinandati na dveṣhṭi tasya prajñā pratiṣhṭhitā

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 5.20 श्रीकृष्ण

न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥

हिंदी अर्थजो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है।

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na prahṛiṣhyet priyaṁ prāpya nodvijet prāpya chāpriyam
sthira-buddhir asammūḍho brahma-vid brahmaṇi sthitaḥ

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 5.19 श्रीकृष्ण

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्माद्ब्रह्मणि ते स्थिताः ॥

हिंदी अर्थजिनका अन्तःकरण समतामें स्थित है, उन्होंने इस जीवित-अवस्थामें ही सम्पूर्ण संसारको जीत लिया है; ब्रह्म निर्दोष और सम है, इसलिये वे ब्रह्ममें ही स्थित हैं।

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ihaiva tair jitaḥ sargo yeṣhāṁ sāmye sthitaṁ manaḥ
nirdoṣhaṁ hi samaṁ brahma tasmād brahmaṇi te sthitāḥ

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 12.17 श्रीकृष्ण

यो न हृष्यति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति।
शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्यः स मे प्रियः ॥

हिंदी अर्थजो न कभी हर्षित होता है, न द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है और जो शुभ-अशुभ कर्मोंमें राग-द्वेषका त्यागी है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

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yo na hṛiṣhyati na dveṣhṭi na śhochati na kāṅkṣhati
śhubhāśhubha-parityāgī bhaktimān yaḥ sa me priyaḥ

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 4.22 श्रीकृष्ण

यदृच्छालाभसन्तुष्टो द्वन्द्वातीतो विमत्सरः।
समः सिद्धावसिद्धौ च कृत्वापि न निबध्यते ॥

हिंदी अर्थजो (कर्मयोगी) फल की इच्छा के बिना, अपने-आप जो कुछ मिल जाय, उसमें सन्तुष्ट रहता है और जो ईर्ष्यासे रहित, द्वन्द्वोंसे अतीत तथा सिद्धि और असिद्धिमें सम है, वह कर्म करते हुए भी उससे नहीं बँधता।

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yadṛichchhā-lābha-santuṣhṭo dvandvātīto vimatsaraḥ
samaḥ siddhāvasiddhau cha kṛitvāpi na nibadhyate

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 18.26 श्रीकृष्ण

मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥

हिंदी अर्थजो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।

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mukta-saṅgo ‘nahaṁ-vādī dhṛity-utsāha-samanvitaḥ
siddhy-asiddhyor nirvikāraḥ kartā sāttvika uchyate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.48 श्रीकृष्ण

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्।
सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृताः ॥

हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन ! दोषयुक्त होनेपर भी सहज कर्मका त्याग नहीं करना चाहिये; क्योंकि सम्पूर्ण कर्म धुएँसे अग्निकी तरह किसी-न-किसी दोषसे युक्त हैं।

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saha-jaṁ karma kaunteya sa-doṣham api na tyajet
sarvārambhā hi doṣheṇa dhūmenāgnir ivāvṛitāḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

दूसरे विषय

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हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।