गीता · धन और लोभ
कुंडलीपंचांग

धन और लोभ पर गीता क्या कहती है?

पैसा, लालच, संतोष

गीता कोई वित्तीय सलाह नहीं देती, पर लोभ को नरक के तीन द्वारों में गिनाती है (16.21) और ईमानदार कमाई व संतोष का महत्व बताती है।

12श्लोक
7अध्याय से
गीता 16.12 श्रीकृष्ण

आशापाशशतैर्बद्धाः कामक्रोधपरायणाः।
ईहन्ते कामभोगार्थमन्यायेनार्थसञ्चयान् ॥

हिंदी अर्थवे आशाकी सैकड़ों फाँसियोंसे बँधे हुए मनुष्य काम-क्रोधके परायण होकर पदार्थोंका भोग करनेके लिये अन्यायपूर्वक धन-संचय करनेकी चेष्टा करते रहते हैं।

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āśhā-pāśha-śhatair baddhāḥ kāma-krodha-parāyaṇāḥ
īhante kāma-bhogārtham anyāyenārtha-sañchayān

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.13 श्रीकृष्ण

इदमद्य मया लब्धमिमं प्राप्स्ये मनोरथम्।
इदमस्तीदमपि मे भविष्यति पुनर्धनम् ॥

हिंदी अर्थइतनी वस्तुएँ तो हमने आज प्राप्त कर लीं और अब इस मनोरथको प्राप्त (पूरा) कर लेंगे।,इतना धन तो हमारे पास है ही, इतना धन फिर हो जायगा।

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idam adya mayā labdham imaṁ prāpsye manoratham
idam astīdam api me bhaviṣhyati punar dhanam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.15 श्रीकृष्ण

आढ्योऽभिजनवानस्मि कोऽन्योऽस्ति सदृशो मया।
यक्ष्ये दास्यामि मोदिष्य इत्यज्ञानविमोहिताः ॥

हिंदी अर्थहम धनवान् हैं, बहुत-से मनुष्य हमारे पास हैं, हमारे समान और कौन है? हम खूब यज्ञ करेंगे, दान देंगे और मौज करेंगे -- इस तरह वे अज्ञानसे मोहित रहते हैं।

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āḍhyo ’bhijanavān asmi ko ’nyo ’sti sadṛiśho mayā
yakṣhye dāsyāmi modiṣhya ity ajñāna-vimohitāḥ
aneka-chitta-vibhrāntā moha-jāla-samāvṛitāḥ
prasaktāḥ kāma-bhogeṣhu patanti narake ’śhuchau

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 14.12 श्रीकृष्ण

लोभः प्रवृत्तिरारम्भः कर्मणामशमः स्पृहा।
रजस्येतानि जायन्ते विवृद्धे भरतर्षभ ॥

हिंदी अर्थहे भरतवंशमें श्रेष्ठ अर्जुन ! रजोगुणके बढ़नेपर लोभ, प्रवृत्ति, कर्मोंका आरम्भ, अशान्ति और स्पृहा -- ये वृत्तियाँ पैदा होती हैं।

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lobhaḥ pravṛittir ārambhaḥ karmaṇām aśhamaḥ spṛihā
rajasy etāni jāyante vivṛiddhe bharatarṣhabha

अध्याय 14 · गुणत्रयविभागयोग
गीता 14.17 श्रीकृष्ण

सत्त्वात्सञ्जायते ज्ञानं रजसो लोभ एव च।
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ॥

हिंदी अर्थसत्त्वगुणसे ज्ञान और रजोगुणसे लोभ आदि ही उत्पन्न होते हैं; तमोगुणसे प्रमाद, मोह एवं अज्ञान भी उत्पन्न होता है।

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sattvāt sañjāyate jñānaṁ rajaso lobha eva cha
pramāda-mohau tamaso bhavato ’jñānam eva cha

अध्याय 14 · गुणत्रयविभागयोग
गीता 2.44 श्रीकृष्ण

भोगैश्वर्यप्रसक्तानां तयापहृतचेतसाम्।
व्यवसायात्मिका बुद्धिः समाधौ न विधीयते ॥

हिंदी अर्थउस पुष्पित वाणीसे जिसका अन्तःकरण हर लिया गया है अर्थात् भोगोंकी तरफ खिंच गया है और जो भोग तथा ऐश्वर्यमें अत्यन्त आसक्त हैं, उन मनुष्योंकी परमात्मामें निश्चयात्मिका बुद्धि नहीं होती।

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bhogaiśwvarya-prasaktānāṁ tayāpahṛita-chetasām
vyavasāyātmikā buddhiḥ samādhau na vidhīyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 4.21 श्रीकृष्ण

निराशीर्यतचित्तात्मा त्यक्तसर्वपरिग्रहः।
शारीरं केवलं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

हिंदी अर्थजिसका शरीर और अन्तःकरण अच्छी तरहसे वशमें किया हुआ है, जिसने सब प्रकारके संग्रहका परित्याग कर दिया है, ऐसा आशारहित कर्मयोगी केवल शरीर-सम्बन्धी कर्म करता हुआ भी पापको प्राप्त नहीं होता।

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nirāśhīr yata-chittātmā tyakta-sarva-parigrahaḥ
śhārīraṁ kevalaṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 18.27 श्रीकृष्ण

रागी कर्मफलप्रेप्सुर्लुब्धो हिंसात्मकोऽशुचिः।
हर्षशोकान्वितः कर्ता राजसः परिकीर्तितः ॥

हिंदी अर्थजो कर्ता रागी, कर्मफलकी इच्छावाला, लोभी, हिंसाके स्वभाववाला, अशुद्ध और हर्षशोकसे युक्त है, वह राजस कहा गया है।

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rāgī karma-phala-prepsur lubdho hinsātmako ‘śhuchiḥ
harṣha-śhokānvitaḥ kartā rājasaḥ parikīrtitaḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.44 श्रीकृष्ण

कृषिगौरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्।
परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्यापि स्वभावजम् ॥

हिंदी अर्थखेती करना, गायोंकी रक्षा करना और शुद्ध व्यापार करना -- ये सब-के-सब वैश्यके स्वाभाविक कर्म हैं, तथा चारों वर्णोंकी सेवा करना शूद्रका भी स्वाभाविक कर्म है।

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kṛiṣhi-gau-rakṣhya-vāṇijyaṁ vaiśhya-karma svabhāva-jam
paricharyātmakaṁ karma śhūdrasyāpi svabhāva-jam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 1.38 से 1.39 अर्जुन

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

यद्यप्येते न पश्यन्ति लोभोपहतचेतसः।
कुलक्षयकृतं दोषं मित्रद्रोहे च पातकम् ॥ 1.38 ॥
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्।
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दन ॥ 1.39 ॥

हिंदी अर्थयद्यपि लोभ के कारण जिनका विवेक-विचार लुप्त हो गया है, ऐसे ये (दुर्योधन आदि) कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को और मित्रों के साथ द्वेष करने से होनेवाले पाप को नहीं देखते, (तो भी) हे जनार्दन! कुल का नाश करने से होनेवाले दोष को ठीक-ठीक जाननेवाले हमलोग इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों न करें?

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yady apy ete na paśhyanti lobhopahata-chetasaḥ
kula-kṣhaya-kṛitaṁ doṣhaṁ mitra-drohe cha pātakam
kathaṁ na jñeyam asmābhiḥ pāpād asmān nivartitum
kula-kṣhaya-kṛitaṁ doṣhaṁ prapaśhyadbhir janārdana

अध्याय 1 · अर्जुनविषादयोग
गीता 6.8 श्रीकृष्ण

ज्ञानविज्ञानतृप्तात्मा कूटस्थो विजितेन्द्रियः।
युक्त इत्युच्यते योगी समलोष्टाश्मकाञ्चनः ॥

हिंदी अर्थजिसका अन्तःकरण ज्ञान-विज्ञानसे तृप्त है, जो कूटकी तरह निर्विकार है, जितेन्द्रिय है और मिट्टीके ढेले, पत्थर तथा स्वर्णमें समबुद्धिवाला है -- ऐसा योगी युक्त (योगारूढ़) कहा जाता है।

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jñāna-vijñāna-tṛiptātmā kūṭa-stho vijitendriyaḥ
yukta ityuchyate yogī sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।