गीता · सेवा और दान
कुंडलीपंचांग

सेवा और दान पर गीता क्या कहती है?

मदद, दान, परोपकार

गीता कहती है कि दूसरों के साथ बाँटे बिना अकेले भोगने वाला “चोर” है (3.12), और सात्त्विक दान वही है जो बदले की आशा के बिना दिया जाए (17.20)।

12श्लोक
5अध्याय से
गीता 3.12 श्रीकृष्ण

इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः।
तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥

हिंदी अर्थयज्ञसे भावित (पुष्ट) हुए देवता भी तुमलोगोंको (बिना माँगे ही) कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री देते रहेंगे। इस प्रकार उन देवताओंसे प्राप्त हुई सामग्रीको दूसरोंकी सेवामें लगाये बिना जो मनुष्य स्वयं ही उसका उपभोग करता है, वह चोर ही है।

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iṣhṭān bhogān hi vo devā dāsyante yajña-bhāvitāḥ
tair dattān apradāyaibhyo yo bhuṅkte stena eva saḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.13 श्रीकृष्ण

यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः।
भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात् ॥

हिंदी अर्थयज्ञशेष- (योग-) का अनुभव करनेवाले श्रेष्ठ मनुष्य सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। परन्तु जो केवल अपने लिये ही पकाते अर्थात् सब कर्म करते हैं, वे पापीलोग तो पापका ही भक्षण करते हैं।

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yajña-śhiṣhṭāśhinaḥ santo muchyante sarva-kilbiṣhaiḥ
bhuñjate te tvaghaṁ pāpā ye pachantyātma-kāraṇāt

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.9 श्रीकृष्ण

यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचर ॥

हिंदी अर्थयज्ञ (कर्तव्यपालन) के लिये किये जानेवाले कर्मोंसे अन्यत्र (अपने लिये किये जानेवाले) कर्मोंमें लगा हुआ यह मनुष्य-समुदाय कर्मोंसे बँधता है, इसलिये हे कुन्तीनन्दन ! तू आसक्ति-रहित होकर उस यज्ञके लिये ही कर्तव्य-कर्म कर।

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yajñārthāt karmaṇo ’nyatra loko ’yaṁ karma-bandhanaḥ
tad-arthaṁ karma kaunteya mukta-saṅgaḥ samāchara

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.10 से 3.11 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः।
अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥ 3.10 ॥
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः।
परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ॥ 3.11 ॥

हिंदी अर्थप्रजापति ब्रह्माजीने सृष्टिके आदिकालमें कर्तव्य-कर्मोंके विधानसहित प्रजा-(मनुष्य आदि-) की रचना करके उनसे (प्रधानतया मनुष्योंसे) कहा कि तुमलोग इस कर्तव्यके द्वारा सबकी वृद्धि करो और वह कर्तव्य-कर्म-रूप यज्ञ तुमलोगोंको कर्तव्य-पालनकी आवश्यक सामग्री प्रदान करनेवाला हो। अपने कर्तव्य-कर्मके द्वारा तुमलोग देवताओंको उन्नत करो और वे देवतालोग अपने कर्तव्यके द्वारा तुमलोगोंको उन्नत करें। इस प्रकार एक-दूसरेको उन्नत करते हुए तुमलोग परम कल्याणको प्राप्त हो जाओगे।

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saha-yajñāḥ prajāḥ sṛiṣhṭvā purovācha prajāpatiḥ
anena prasaviṣhyadhvam eṣha vo ’stviṣhṭa-kāma-dhuk
devān bhāvayatānena te devā bhāvayantu vaḥ
parasparaṁ bhāvayantaḥ śhreyaḥ param avāpsyatha

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 5.25 श्रीकृष्ण

लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥

हिंदी अर्थजिनका शरीर मन-बुद्धि-इन्द्रियोंसहित वशमें है, जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत हैं, जिनके सम्पूर्ण संशय मिट गये हैं, जिनके सम्पूर्ण कल्मष (दोष) नष्ट हो गये हैं, वे विवेकी साधक निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होते हैं।

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labhante brahma-nirvāṇam ṛiṣhayaḥ kṣhīṇa-kalmaṣhāḥ
chhinna-dvaidhā yatātmānaḥ sarva-bhūta-hite ratāḥ

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 12.3 से 12.4 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

ये त्वक्षरमनिर्देश्यमव्यक्तं पर्युपासते।
सर्वत्रगमचिन्त्यं च कूटस्थमचलं ध्रुवम् ॥ 12.3 ॥
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः।
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताः ॥ 12.4 ॥

हिंदी अर्थजो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य, सब जगह परिपूर्ण, अनिर्देश्य, कूटस्थ, अचल, ध्रुव, अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं, वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।

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ye tv akṣharam anirdeśhyam avyaktaṁ paryupāsate
sarvatra-gam achintyañcha kūṭa-stham achalandhruvam
sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ
te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ
sanniyamyendriya-grāmaṁ sarvatra sama-buddhayaḥ te prāpnuvanti mām eva sarva-bhūta-hite ratāḥ

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 17.20 श्रीकृष्ण

दातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे।
देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थदान देना कर्तव्य है -- ऐसे भावसे जो दान देश, काल और पात्रके प्राप्त होनेपर अनुपकारीको दिया जाता है, वह दान सात्त्विक कहा गया है।

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dātavyam iti yad dānaṁ dīyate ‘nupakāriṇe
deśhe kāle cha pātre cha tad dānaṁ sāttvikaṁ smṛitam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.21 श्रीकृष्ण

यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः।
दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थकिन्तु जो दान प्रत्युपकारके लिये अथवा फलप्राप्तिका उद्देश्य बनाकर फिर क्लेशपूर्वक दिया जाता है, वह दान राजस कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

yat tu pratyupakārārthaṁ phalam uddiśhya vā punaḥ
dīyate cha parikliṣhṭaṁ tad dānaṁ rājasaṁ smṛitam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.22 श्रीकृष्ण

अदेशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते।
असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थजो दान बिना सत्कारके तथा अवज्ञापूर्वक अयोग्य देश और कालमें कुपात्रको दिया जाता है, वह दान तामस कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

adeśha-kāle yad dānam apātrebhyaśh cha dīyate
asat-kṛitam avajñātaṁ tat tāmasam udāhṛitam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 18.5 श्रीकृष्ण

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्।
यज्ञो दानं तपश्चैव पावनानि मनीषिणाम् ॥

हिंदी अर्थयज्ञ, दान और तपरूप कर्मोंका त्याग नहीं करना चाहिये, प्रत्युत उनको तो करना ही चाहिये क्योंकि यज्ञ, दान और तप -- ये तीनों ही कर्म मनीषियोंको पवित्र करनेवाले हैं।

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yajña-dāna-tapaḥ-karma na tyājyaṁ kāryam eva tat
yajño dānaṁ tapaśh chaiva pāvanāni manīṣhiṇām

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।