गीता · बीमारी और बुढ़ापा
कुंडलीपंचांग

बीमारी और बुढ़ापा पर गीता क्या कहती है?

उम्र, शरीर, कमज़ोरी

गीता चिकित्सा ग्रंथ नहीं है, पर शरीर के बदलने को बचपन, जवानी और बुढ़ापे की तरह स्वाभाविक बताती है (2.13), और समझाती है कि शरीर नाशवान है, आत्मा नहीं।

8श्लोक
5अध्याय से
गीता 2.13 श्रीकृष्ण

देहिनोऽस्मिन्यथा देहे कौमारं यौवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥

हिंदी अर्थदेहधारीके इस मनुष्यशरीरमें जैसे बालकपन, जवानी और वृद्धावस्था होती है, ऐसे ही देहान्तरकी प्राप्ति होती है। उस विषयमें धीर मनुष्य मोहित नहीं होता।

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dehino ’smin yathā dehe kaumāraṁ yauvanaṁ jarā
tathā dehāntara-prāptir dhīras tatra na muhyati

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.18 श्रीकृष्ण

अन्तवन्त इमे देहा नित्यस्योक्ताः शरीरिणः।
अनाशिनोऽप्रमेयस्य तस्माद्युध्यस्व भारत ॥

हिंदी अर्थअविनाशी, अप्रमेय और नित्य रहनेवाले इस शरीरी के ये देह अन्तवाले कहे गये हैं। इसलिये हे अर्जुन! तुम युद्ध करो।

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antavanta ime dehā nityasyoktāḥ śharīriṇaḥ
anāśhino ’prameyasya tasmād yudhyasva bhārata

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 13.8 श्रीकृष्ण

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ॥

हिंदी अर्थइन्द्रियोंके विषयोंमें वैराग्यका होना, अहंकारका भी न होना और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा व्याधियोंमें दुःखरूप दोषोंको बार-बार देखना।

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indriyārtheṣhu vairāgyam anahankāra eva cha
janma-mṛityu-jarā-vyādhi-duḥkha-doṣhānudarśhanam

अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
गीता 7.29 श्रीकृष्ण

जरामरणमोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्म चाखिलम् ॥

हिंदी अर्थजरा (वृद्धावस्था) और मरण (मृत्यु) से मोक्ष पानेके लिये जो  मेरा आश्रय लेकर प्रयत्न करते हैं, वे उस ब्रह्मको, सम्पूर्ण अध्यात्मको और सम्पूर्ण कर्मको भी जान जाते हैं।

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jarā-maraṇa-mokṣhāya mām āśhritya yatanti ye
te brahma tadviduḥ kṛitsnam adhyātmaṁ karma chākhilam

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 14.20 श्रीकृष्ण

गुणानेतानतीत्य त्रीन्देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते ॥

हिंदी अर्थदेहधारी (विवेकी मनुष्य) देहको उत्पन्न करनेवाले इन तीनों गुणोंका अतिक्रमण करके जन्म, मृत्यु और वृद्धावस्थारूप दुःखोंसे रहित हुआ अमरताका अनुभव करता है।

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guṇān etān atītya trīn dehī deha-samudbhavān
janma-mṛityu-jarā-duḥkhair vimukto ’mṛitam aśhnute

अध्याय 14 · गुणत्रयविभागयोग
गीता 15.16 श्रीकृष्ण

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ॥

हिंदी अर्थइस संसारमें क्षर (नाशवान्) और अक्षर (अविनाशी) -- ये दो प्रकारके पुरुष हैं। सम्पूर्ण प्राणियोंके शरीर नाशवान् और कूटस्थ (जीवात्मा) अविनाशी कहा जाता है।

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dvāv imau puruṣhau loke kṣharaśh chākṣhara eva cha
kṣharaḥ sarvāṇi bhūtāni kūṭa-stho ’kṣhara uchyate

अध्याय 15 · पुरुषोत्तमयोग
गीता 13.31 श्रीकृष्ण

अनादित्वान्निर्गुणत्वात्परमात्मायमव्ययः।
शरीरस्थोऽपि कौन्तेय न करोति न लिप्यते ॥

हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन ! यह पुरुष स्वयं अनादि और गुणोंसे रहित होनेसे अविनाशी परमात्मस्वरूप ही है। यह शरीरमें रहता हुआ भी न करता है और न लिप्त होता है।

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anāditvān nirguṇatvāt paramātmāyam avyayaḥ
śharīra-stho ’pi kaunteya na karoti na lipyate

अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
गीता 13.32 श्रीकृष्ण

यथा सर्वगतं सौक्ष्म्यादाकाशं नोपलिप्यते।
सर्वत्रावस्थितो देहे तथाऽऽत्मा नोपलिप्यते ॥

हिंदी अर्थजैसे सब जगह व्याप्त आकाश अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे कहीं भी लिप्त नहीं होता, ऐसे ही सब जगह परिपूर्ण आत्मा किसी भी देहमें लिप्त नहीं होता।

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yathā sarva-gataṁ saukṣhmyād ākāśhaṁ nopalipyate
sarvatrāvasthito dehe tathātmā nopalipyate

अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग

दूसरे विषय

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हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।