गीता · गलती और पछतावा
कुंडलीपंचांग

गलती और पछतावा पर गीता क्या कहती है?

अपराधबोध, सुधार, माफ़ी

पुरानी गलतियों का बोझ भारी होता है। गीता कहती है कि सबसे बड़ा पापी भी ज्ञान की नौका से पार हो सकता है (4.36), और सच्चे मन से भगवान की ओर मुड़ने वाला शीघ्र धर्मात्मा हो जाता है (9.31)।

9श्लोक
6अध्याय से
गीता 4.36 श्रीकृष्ण

अपि चेदसि पापेभ्यः सर्वेभ्यः पापकृत्तमः।
सर्वं ज्ञानप्लवेनैव वृजिनं सन्तरिष्यसि ॥

हिंदी अर्थअगर तू सब पापियोंसे भी अधिक पापी है, तो भी तू ज्ञानरूपी नौकाके द्वारा निःसन्देह सम्पूर्ण पापसमुद्रसे अच्छी तरह तर जायगा।

रोमन में पढ़ें

api ched asi pāpebhyaḥ sarvebhyaḥ pāpa-kṛit-tamaḥ
sarvaṁ jñāna-plavenaiva vṛijinaṁ santariṣhyasi

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 4.37 श्रीकृष्ण

यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥

हिंदी अर्थहे अर्जुन ! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधनोंको सर्वथा भस्म कर देती है, ऐसे ही ज्ञानरूपी अग्नि सम्पूर्ण कर्मोंको सर्वथा भस्म कर देती है।

रोमन में पढ़ें

yathaidhānsi samiddho ’gnir bhasma-sāt kurute ’rjuna
jñānāgniḥ sarva-karmāṇi bhasma-sāt kurute tathā

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 9.30 श्रीकृष्ण

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ॥

हिंदी अर्थअगर कोई दुराचारी-से-दुराचारी भी अनन्यभावसे मेरा भजन करता है, तो उसको साधु ही मानना चाहिये। कारण कि उसने निश्चय बहुत अच्छी तरह कर लिया है।

रोमन में पढ़ें

api chet su-durāchāro bhajate mām ananya-bhāk
sādhur eva sa mantavyaḥ samyag vyavasito hi saḥ

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 9.31 श्रीकृष्ण

क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥

हिंदी अर्थवह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता।

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kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati
kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 9.32 श्रीकृष्ण

मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येऽपि स्युः पापयोनयः।
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेऽपि यान्ति परां गतिम् ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो भी पापयोनिवाले हों तथा जो भी स्त्रियाँ, वैश्य और शूद्र हों, वे भी सर्वथा मेरे शरण होकर निःसन्देह परमगतिको प्राप्त हो जाते हैं।

रोमन में पढ़ें

māṁ hi pārtha vyapāśhritya ye ’pi syuḥ pāpa-yonayaḥ
striyo vaiśhyās tathā śhūdrās te ’pi yānti parāṁ gatim

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 10.3 श्रीकृष्ण

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम्।
असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥

हिंदी अर्थजो मनुष्य मुझे अजन्मा, अनादि और सम्पूर्ण लोकोंका महान् ईश्वर जानता है अर्थात् दृढ़तासे मानता है, वह मनुष्योंमें असम्मूढ़ (जानकार) है और वह सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

yo māmajam anādiṁ cha vetti loka-maheśhvaram
asammūḍhaḥ sa martyeṣhu sarva-pāpaiḥ pramuchyate

अध्याय 10 · विभूतियोग
गीता 5.17 श्रीकृष्ण

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ॥

हिंदी अर्थजिनकी बुद्धि तदाकार हो रही है, जिनका मन तदाकार हो रहा है, जिनकी स्थिति परमात्मतत्वमें है, ऐसे परमात्मपरायण साधक ज्ञानके द्वारा पापरहित होकर अपुनरावृत्ति (परमगति) को प्राप्त होते हैं।

रोमन में पढ़ें

tad-buddhayas tad-ātmānas tan-niṣhṭhās tat-parāyaṇāḥ
gachchhantyapunar-āvṛittiṁ jñāna-nirdhūta-kalmaṣhāḥ

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 7.28 श्रीकृष्ण

येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥

हिंदी अर्थपरन्तु जिन पुण्यकर्मा मनुष्योंके पाप नष्ट गये हैं, वे द्वन्द्वमोहसे रहित हुए मनुष्य दृढ़व्रती होकर मेरा भजन करते हैं।

रोमन में पढ़ें

yeṣhāṁ tvanta-gataṁ pāpaṁ janānāṁ puṇya-karmaṇām
te dvandva-moha-nirmuktā bhajante māṁ dṛiḍha-vratāḥ

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 18.71 श्रीकृष्ण

श्रद्धावाननसूयश्च श्रृणुयादपि यो नरः।
सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥

हिंदी अर्थश्रद्धावान् और दोषदृष्टिसे रहित जो मनुष्य इस गीता-ग्रन्थको सुन भी लेगा, वह भी सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त होकर पुण्यकारियोंके शुभ लोकोंको प्राप्त हो जायगा।

रोमन में पढ़ें

śhraddhāvān anasūyaśh cha śhṛiṇuyād api yo naraḥ
so ‘pi muktaḥ śhubhāl lokān prāpnuyāt puṇya-karmaṇām

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।