गीता · सेहत
कुंडलीपंचांग

सेहत पर गीता क्या कहती है?

खान-पान, नींद, संयम

गीता चिकित्सा ग्रंथ नहीं है, पर भोजन, नींद और दिनचर्या के संतुलन पर स्पष्ट बात करती है — विशेषकर अध्याय 6 और 17 में।

8श्लोक
3अध्याय से
गीता 6.16 श्रीकृष्ण

नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥

हिंदी अर्थहे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है।

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nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ
na chāti-svapna-śhīlasya jāgrato naiva chārjuna

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.17 श्रीकृष्ण

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।

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yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu
yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 17.8 श्रीकृष्ण

आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः।
रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥

हिंदी अर्थआयु, सत्त्वगुण, बल, आरोग्य, सुख और प्रसन्नता बढ़ानेवाले, स्थिर रहनेवाले, हृदयको शक्ति देनेवाले, रसयुक्त तथा चिकने -- ऐसे आहार अर्थात् भोजन करनेके पदार्थ सात्त्विक मनुष्यको प्रिय होते हैं।

रोमन में पढ़ें

āyuḥ-sattva-balārogya-sukha-prīti-vivardhanāḥ
rasyāḥ snigdhāḥ sthirā hṛidyā āhārāḥ sāttvika-priyāḥ

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.9 श्रीकृष्ण

कट्वम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः।
आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः ॥

हिंदी अर्थअति कड़वे, अति खट्टे, अति नमकीन, अति गरम, अति तीखे, अति रूखे और अति दाहकारक आहार अर्थात् भोजनके पदार्थ राजस मनुष्यको प्रिय होते हैं, जो कि दुःख, शोक और रोगोंको देनेवाले हैं।

रोमन में पढ़ें

kaṭv-amla-lavaṇāty-uṣhṇa- tīkṣhṇa-rūkṣha-vidāhinaḥ
āhārā rājasasyeṣhṭā duḥkha-śhokāmaya-pradāḥ

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.10 श्रीकृष्ण

यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत्।
उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम् ॥

हिंदी अर्थजो भोजन अधपका, रसरहित, दुर्गन्धित, बासी और उच्छिष्ट है तथा जो महान् अपवित्र भी है, वह तामस मनुष्यको प्रिय होता है।

रोमन में पढ़ें

yāta-yāmaṁ gata-rasaṁ pūti paryuṣhitaṁ cha yat
uchchhiṣhṭam api chāmedhyaṁ bhojanaṁ tāmasa-priyam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 4.29 से 4.30 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

अपाने जुह्वति प्राण प्राणेऽपानं तथाऽपरे।
प्राणापानगती रुद्ध्वा प्राणायामपरायणाः ॥ 4.29 ॥
अपरे नियताहाराः प्राणान्प्राणेषु जुह्वति।
सर्वेऽप्येते यज्ञविदो यज्ञक्षपितकल्मषाः ॥ 4.30 ॥

हिंदी अर्थदूसरे कितने ही प्राणायामके परायण हुए योगीलोग अपानमें प्राणका पूरक करके, प्राण और अपानकी गति रोककर फिर प्राणमें अपानका हवन करते हैं; तथा अन्य कितने ही नियमित आहार करनेवाले प्राणोंका प्राणोंमें हवन किया करते हैं। ये सभी साधक यज्ञोंद्वारा पापोंका नाश करनेवाले और यज्ञोंको जाननेवाले हैं।

रोमन में पढ़ें

apāne juhvati prāṇaṁ prāṇe ’pānaṁ tathāpare
prāṇāpāna-gatī ruddhvā prāṇāyāma-parāyaṇāḥ
apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣhu juhvati
sarve ’pyete yajña-vido yajña-kṣhapita-kalmaṣhāḥ
apare niyatāhārāḥ prāṇān prāṇeṣu juhvati

sarve py 'ete yajña-vido yajña-kṣapita-kalmaṣāḥ

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 17.14 श्रीकृष्ण

देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्।
ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थदेवता, ब्राह्मण, गुरुजन और जीवन्मुक्त महापुरुषका पूजन करना, शुद्धि रखना, सरलता, ब्रह्मचर्यका पालन करना और हिंसा न करना -- यह शरीरसम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

deva-dwija-guru-prājña- pūjanaṁ śhaucham ārjavam
brahmacharyam ahinsā cha śhārīraṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।