गीता · पढ़ाई और ज्ञान
कुंडलीपंचांग

पढ़ाई और ज्ञान पर गीता क्या कहती है?

सीखना, परीक्षा, समझ

गीता ज्ञान को सबसे पवित्र करने वाला बताती है (4.38), और सीखने का तरीका भी — विनम्रता, प्रश्न और सेवा (4.34)। श्रद्धा और संयम वाले को ज्ञान मिलता है (4.39)।

14श्लोक
7अध्याय से
गीता 4.34 श्रीकृष्ण

तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥

हिंदी अर्थउस- (तत्त्वज्ञान-) को (तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषोंके पास जाकर) समझ। उनको साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे।

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tad viddhi praṇipātena paripraśhnena sevayā
upadekṣhyanti te jñānaṁ jñāninas tattva-darśhinaḥ

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 4.38 श्रीकृष्ण

न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति ॥

हिंदी अर्थइस मनुष्यलोकमें ज्ञानके समान पवित्र करनेवाला निःसन्देह दूसरा कोई साधन नहीं है। जिसका योग भली-भाँति सिद्ध हो गया है, वह (कर्मयोगी) उस तत्त्वज्ञानको अवश्य ही स्वयं अपने-आपमें पा लेता है।

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na hi jñānena sadṛiśhaṁ pavitramiha vidyate
tatsvayaṁ yogasansiddhaḥ kālenātmani vindati

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 4.39 श्रीकृष्ण

श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥

हिंदी अर्थजो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

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śhraddhāvān labhate jñānaṁ tat-paraḥ sanyatendriyaḥ
jñānaṁ labdhvā parāṁ śhāntim achireṇādhigachchhati

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 4.33 श्रीकृष्ण

श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥

हिंदी अर्थहे परन्तप अर्जुन ! द्रव्यमय यज्ञसे ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ है। सम्पूर्ण कर्म और पदार्थ ज्ञान-(तत्त्वज्ञान-) में समाप्त हो जाते हैं।

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śhreyān dravya-mayād yajñāj jñāna-yajñaḥ parantapa
sarvaṁ karmākhilaṁ pārtha jñāne parisamāpyate

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 4.35 श्रीकृष्ण

यज्ज्ञात्वा न पुनर्मोहमेवं यास्यसि पाण्डव।
येन भूतान्यशेषेण द्रक्ष्यस्यात्मन्यथो मयि ॥

हिंदी अर्थजिस- (तत्त्वज्ञान-) का अनुभव करनेके बाद तू फिर इस प्रकार मोहको नहीं प्राप्त होगा, और हे अर्जुन ! जिस- (तत्त्वज्ञान-) से तू सम्पूर्ण प्राणियोंको निःशेषभावसे पहले अपनेमें और उसके बाद मुझ सच्चिदानन्दघन परमात्मामें देखेगा।

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yaj jñātvā na punar moham evaṁ yāsyasi pāṇḍava
yena bhūtānyaśheṣheṇa drakṣhyasyātmanyatho mayi

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 17.15 श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

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anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 13.11 श्रीकृष्ण

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोन्यथा ॥

हिंदी अर्थअध्यात्मज्ञानमें नित्य-निरन्तर रहना, तत्त्वज्ञानके अर्थरूप परमात्माको सब जगह देखना -- यह (पूर्वोक्त साधन-समुदाय) तो ज्ञान है; और जो इसके विपरीत है वह अज्ञान है -- ऐसा कहा गया है।

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adhyātma-jñāna-nityatvaṁ tattva-jñānārtha-darśhanam
etaj jñānam iti proktam ajñānaṁ yad ato ’nyathā

अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
गीता 14.11 श्रीकृष्ण

सर्वद्वारेषु देहेऽस्मिन्प्रकाश उपजायते।
ज्ञानं यदा तदा विद्याद्विवृद्धं सत्त्वमित्युत ॥

हिंदी अर्थजब इस मनुष्यशरीरमें सब द्वारों-(इन्द्रियों और अन्तःकरण-) में प्रकाश (स्वच्छता) और ज्ञान (विवेक) प्रकट हो जाता है, तब जानना चाहिये कि सत्त्वगुण बढ़ा हुआ है।

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sarva-dvāreṣhu dehe ’smin prakāśha upajāyate
jñānaṁ yadā tadā vidyād vivṛiddhaṁ sattvam ity uta

अध्याय 14 · गुणत्रयविभागयोग
गीता 18.20 श्रीकृष्ण

सर्वभूतेषु येनैकं भावमव्ययमीक्षते।
अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्विकम् ॥

हिंदी अर्थजिस ज्ञानके द्वारा साधक सम्पूर्ण विभक्त प्राणियोंमें विभागरहित एक अविनाशी भाव-(सत्ता-) को देखता है, उस ज्ञानको तुम सात्त्विक समझो।

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sarva-bhūteṣhu yenaikaṁ bhāvam avyayam īkṣhate
avibhaktaṁ vibhakteṣhu taj jñānaṁ viddhi sāttvikam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.21 श्रीकृष्ण

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पृथग्विधान्।
वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम् ॥

हिंदी अर्थपरन्तु जो ज्ञान अर्थात् जिस ज्ञानके द्वारा मनुष्य सम्पूर्ण प्राणियोंमें अलग-अलग अनेक भावोंको अलग-अलग रूपसे जानता है, उस ज्ञानको तुम राजस समझो।

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pṛithaktvena tu yaj jñānaṁ nānā-bhāvān pṛithag-vidhān
vetti sarveṣhu bhūteṣhu taj jñānaṁ viddhi rājasam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.22 श्रीकृष्ण

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्।
अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थकिंतु जो (ज्ञान) एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके तरह आसक्त है तथा जो युक्तिरहित, वास्तविक ज्ञानसे रहित और तुच्छ है, वह तामस कहा गया है।

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yat tu kṛitsna-vad ekasmin kārye saktam ahaitukam
atattvārtha-vad alpaṁ cha tat tāmasam udāhṛitam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 7.2 श्रीकृष्ण

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ॥

हिंदी अर्थतेरे लिये मैं विज्ञानसहित ज्ञान सम्पूर्णतासे कहूँगा, जिसको जाननेके बाद फिर यहाँ कुछ भी जानना बाकी नहीं रहेगा।

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jñānaṁ te ’haṁ sa-vijñānam idaṁ vakṣhyāmyaśheṣhataḥ
yaj jñātvā neha bhūyo ’nyaj jñātavyam-avaśhiṣhyate

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 10.32 श्रीकृष्ण

सर्गाणामादिरन्तश्च मध्यं चैवाहमर्जुन।
अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् ॥

हिंदी अर्थहे अर्जुन ! सम्पूर्ण सर्गोंके आदि, मध्य तथा अन्तमें मैं ही हूँ। विद्याओंमें अध्यात्मविद्या और परस्पर शास्त्रार्थ करनेवालोंका(तत्त्व-निर्णयके लिये किया जानेवाला) वाद मैं हूँ।

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sargāṇām ādir antaśh cha madhyaṁ chaivāham arjuna
adhyātma-vidyā vidyānāṁ vādaḥ pravadatām aham

अध्याय 10 · विभूतियोग
गीता 18.70 श्रीकृष्ण

अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः।
ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥

हिंदी अर्थजो मनुष्य हम दोनोंके इस धर्ममय संवादका अध्ययन करेगा, उसके द्वारा भी मैं ज्ञानयज्ञसे पूजित होऊँगा -- ऐसा मेरा मत है।

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adhyeṣhyate cha ya imaṁ dharmyaṁ saṁvādam āvayoḥ
jñāna-yajñena tenāham iṣhṭaḥ syām iti me matiḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।