गीता · इच्छाएँ और लत
कुंडलीपंचांग

इच्छाएँ और लत पर गीता क्या कहती है?

लालसा, आदतें, इन्द्रियाँ

अर्जुन ने पूछा था — मनुष्य न चाहते हुए भी गलत काम क्यों कर बैठता है? उत्तर में गीता कामना (इच्छा) को पहचानती है और इन्द्रियों को वश में करने का रास्ता बताती है।

16श्लोक
5अध्याय से
गीता 3.36 अर्जुन

अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥

हिंदी अर्थहे वार्ष्णेय ! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती लगाये हुएकी तरह किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है?

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arjuna uvācha
atha kena prayukto ’yaṁ pāpaṁ charati pūruṣhaḥ
anichchhann api vārṣhṇeya balād iva niyojitaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.37 श्रीकृष्ण

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥

हिंदी अर्थरजोगुणसे उत्पन्न हुआ  यह काम ही क्रोध  है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।

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śhrī bhagavān uvācha
kāma eṣha krodha eṣha rajo-guṇa-samudbhavaḥ
mahāśhano mahā-pāpmā viddhyenam iha vairiṇam

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.38 श्रीकृष्ण

धूमेनाव्रियते वह्निर्यथाऽऽदर्शो मलेन च।
यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम् ॥

हिंदी अर्थजैसे धुएँसे अग्नि और मैलसे दर्पण ढक जाता है तथा जैसे जेरसे गर्भ ढका रहता है, ऐसे ही उस कामके द्वारा यह ज्ञान ( विवेक) ढका हुआ है।

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dhūmenāvriyate vahnir yathādarśho malena cha
yatholbenāvṛito garbhas tathā tenedam āvṛitam

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.39 श्रीकृष्ण

आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा।
कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥

हिंदी अर्थऔर हे कुन्तीनन्दन ! इस अग्निके समान कभी तृप्त न होनेवाले और विवेकियोंके नित्य वैरी इस कामके द्वारा मनुष्यका विवेक ढका हुआ है।

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āvṛitaṁ jñānam etena jñānino nitya-vairiṇā
kāma-rūpeṇa kaunteya duṣhpūreṇānalena cha

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.40 श्रीकृष्ण

इन्द्रियाणि मनो बुद्धिरस्याधिष्ठानमुच्यते।
एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम् ॥

हिंदी अर्थइन्द्रियाँ, मन और बुद्धि इस कामके वास-स्थान कहे गये हैं। यह काम इन- (इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि-) के द्वारा ज्ञानको ढककर देहाभिमानी मनुष्यको मोहित करता है।

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indriyāṇi mano buddhir asyādhiṣhṭhānam uchyate
etair vimohayatyeṣha jñānam āvṛitya dehinam

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.41 श्रीकृष्ण

तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम् ॥

हिंदी अर्थइसलिये हे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! तू सबसे पहले इन्द्रियोंको वशमें करके इस ज्ञान और विज्ञानका नाश करनेवाले महान् पापी कामको अवश्य ही बलपूर्वक मार डाल।

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tasmāt tvam indriyāṇyādau niyamya bharatarṣhabha
pāpmānaṁ prajahi hyenaṁ jñāna-vijñāna-nāśhanam

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.42 से 3.43 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ 3.42 ॥
एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ 3.43 ॥

हिंदी अर्थइन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे भी पर है, वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर - (काम-) को जानकर अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।

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indriyāṇi parāṇyāhur indriyebhyaḥ paraṁ manaḥ
manasas tu parā buddhir yo buddheḥ paratas tu saḥ
evaṁ buddheḥ paraṁ buddhvā sanstabhyātmānam ātmanā
jahi śhatruṁ mahā-bāho kāma-rūpaṁ durāsadam

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 2.58 श्रीकृष्ण

यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

हिंदी अर्थजिस तरह कछुआ अपने अङ्गोंको सब ओरसे समेट लेता है, ऐसे ही जिस कालमें यह कर्मयोगी इन्द्रियोंके विषयोंसे इन्द्रियोंको सब प्रकारसे समेट लेता (हटा लेता) है, तब उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित हो जाती है।

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yadā sanharate chāyaṁ kūrmo ’ṅgānīva sarvaśhaḥ
indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣhṭhitā

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.59 श्रीकृष्ण

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥

हिंदी अर्थनिराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।

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viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ
rasa-varjaṁ raso ’pyasya paraṁ dṛiṣhṭvā nivartate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.61 श्रीकृष्ण

तानि सर्वाणि संयम्य युक्त आसीत मत्परः।
वशे हि यस्येन्द्रियाणि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

हिंदी अर्थकर्मयोगी साधक उन सम्पूर्ण इन्द्रियोंको वशमें करके मेरे परायण होकर बैठे; क्योंकि जिसकी इन्द्रियाँ वशमें हैं, उसकी बुद्धि प्रतिष्ठित है।

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tāni sarvāṇi sanyamya yukta āsīta mat-paraḥ
vaśhe hi yasyendriyāṇi tasya prajñā pratiṣhṭhitā

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.68 श्रीकृष्ण

तस्माद्यस्य महाबाहो निगृहीतानि सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ॥

हिंदी अर्थइसलिये हे महाबाहो ! जिस मनुष्यकी इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंसे सर्वथा निगृहीत (वशमें की हुई) हैं, उसकी बुद्धि स्थिर है।

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tasmād yasya mahā-bāho nigṛihītāni sarvaśhaḥ
indriyāṇīndriyārthebhyas tasya prajñā pratiṣhṭhitā

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 3.6 श्रीकृष्ण

कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन्।
इन्द्रियार्थान्विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते ॥

हिंदी अर्थजो कर्मेन्द्रियों- (सम्पूर्ण इन्द्रियों-) को हठपूर्वक रोककर मनसे इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मूढ़ बुद्धिवाला मनुष्य मिथ्याचारी (मिथ्या आचरण करनेवाला) कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

karmendriyāṇi sanyamya ya āste manasā smaran
indriyārthān vimūḍhātmā mithyāchāraḥ sa uchyate

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 5.22 श्रीकृष्ण

ये हि संस्पर्शजा भोगा दुःखयोनय एव ते।
आद्यन्तवन्तः कौन्तेय न तेषु रमते बुधः ॥

हिंदी अर्थक्योंकि हे कुन्तीनन्दन ! जो इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे पैदा होनेवाले भोग (सुख) हैं, वे आदि-अन्तवाले और दुःखके ही कारण हैं। अतः विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता।

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ye hi sansparśha-jā bhogā duḥkha-yonaya eva te
ādyantavantaḥ kaunteya na teṣhu ramate budhaḥ

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 18.38 श्रीकृष्ण

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थजो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है।

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viṣhayendriya-sanyogād yat tad agre ’mṛitopamam
pariṇāme viṣham iva tat sukhaṁ rājasaṁ smṛitam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 7.11 श्रीकृष्ण

बलं बलवतां चाहं कामरागविवर्जितम्।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ॥

हिंदी अर्थहे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! बलवालोंमें काम और रागसे रहित बल मैं हूँ। मनुषयोंमें धर्मसे अविरुद्ध (धर्मयुक्त) काम मैं हूँ।

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balaṁ balavatāṁ chāhaṁ kāma-rāga-vivarjitam
dharmāviruddho bhūteṣhu kāmo ’smi bharatarṣhabha

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।