गीता · अहंकार
कुंडलीपंचांग

अहंकार पर गीता क्या कहती है?

घमंड, दिखावा, ज़िद

गीता कहती है कि अहंकार से मोहित मनुष्य ही मानता है “मैं कर्ता हूँ” (3.27)। अध्याय 16 में घमंड और दिखावे को आसुरी स्वभाव का लक्षण बताया गया है।

16श्लोक
7अध्याय से
गीता 3.27 श्रीकृष्ण

प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।
अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताऽहमिति मन्यते ॥

हिंदी अर्थसम्पूर्ण कर्म सब प्रकारसे प्रकृतिके गुणोंद्वारा किये जाते हैं; परन्तु अहंकारसे मोहित अन्तःकरणवाला अज्ञानी मनुष्य 'मैं कर्ता हूँ' -- ऐसा मानता है।

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prakṛiteḥ kriyamāṇāni guṇaiḥ karmāṇi sarvaśhaḥ
ahankāra-vimūḍhātmā kartāham iti manyate

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.28 श्रीकृष्ण

तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः।
गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते ॥

हिंदी अर्थहे महाबाहो! गुण-विभाग और कर्म-विभागको तत्त्वसे जाननेवाला महापुरुष 'सम्पूर्ण गुण ही गुणोंमें बरत रहे हैं' --  ऐसा मानकर उनमें आसक्त नहीं होता।

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tattva-vit tu mahā-bāho guṇa-karma-vibhāgayoḥ
guṇā guṇeṣhu vartanta iti matvā na sajjate

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 13.7 श्रीकृष्ण

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ॥

हिंदी अर्थमानित्व-(अपनेमें श्रेष्ठताके भाव-) का न होना, दम्भित्व-(दिखावटीपन-) का न होना, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुकी सेवा, बाहर-भीतरकी शुद्धि, स्थिरता और मनका वशमें होना।

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amānitvam adambhitvam ahinsā kṣhāntir ārjavam
āchāryopāsanaṁ śhauchaṁ sthairyam ātma-vinigrahaḥ

अध्याय 13 · क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग
गीता 15.5 श्रीकृष्ण

निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा
अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः।
द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसंज्ञै
र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत् ॥

हिंदी अर्थजो मान और मोहसे रहित हो गये हैं, जिन्होंने आसक्तिसे होनेवाले दोषोंको जीत लिया है, जो नित्य-निरन्तर परमात्मामें ही लगे हुए हैं, जो (अपनी दृष्टिसे) सम्पूर्ण कामनाओंसे रहित हो गये हैं, जो सुख-दुःखरूप द्वन्द्वोंसे मुक्त हो गये हैं, ऐसे (ऊँची स्थितिवाले) मोहरहित साधक भक्त उस अविनाशी परमपद-(परमात्मा-) को प्राप्त होते हैं।

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nirmāna-mohā jita-saṅga-doṣhā
adhyātma-nityā vinivṛitta-kāmāḥ
dvandvair vimuktāḥ sukha-duḥkha-sanjñair
gachchhanty amūḍhāḥ padam avyayaṁ tat

अध्याय 15 · पुरुषोत्तमयोग
गीता 16.4 श्रीकृष्ण

दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! दम्भ करना, घमण्ड करना, अभिमान करना, क्रोध करना, कठोरता रखना और अविवेकका होना भी -- ये सभी आसुरीसम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

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dambho darpo ’bhimānaśh cha krodhaḥ pāruṣhyam eva cha
ajñānaṁ chābhijātasya pārtha sampadam āsurīm

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.10 श्रीकृष्ण

काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः।
मोहाद्गृहीत्वासद्ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचिव्रताः ॥

हिंदी अर्थकभी पूरी न होनेवाली कामनाओंका आश्रय लेकर दम्भ, अभिमान और मदमें चूर रहनेवाले तथा अपवित्र व्रत धारण करनेवाले मनुष्य मोहके कारण दुराग्रहोंको धारण करके संसारमें विचरते रहते हैं।

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kāmam āśhritya duṣhpūraṁ dambha-māna-madānvitāḥ
mohād gṛihītvāsad-grāhān pravartante ’śhuchi-vratāḥ

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.14 श्रीकृष्ण

असौ मया हतः शत्रुर्हनिष्ये चापरानपि।
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान्सुखी ॥

हिंदी अर्थवह शत्रु तो हमारे द्वारा मारा गया और उन दूसरे शत्रुओंको भी हम मार डालेंगे। हम सर्वसमर्थ हैं। हमारे पास भोग-सामग्री बहुत है। हम सिद्ध हैं। हम बड़े बलवान् और सुखी हैं।

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asau mayā hataḥ śhatrur haniṣhye chāparān api
īśhvaro ’ham ahaṁ bhogī siddho ’haṁ balavān sukhī

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 16.17 श्रीकृष्ण

आत्मसम्भाविताः स्तब्धा धनमानमदान्विताः।
यजन्ते नामयज्ञैस्ते दम्भेनाविधिपूर्वकम् ॥

हिंदी अर्थअपनेको सबसे अधिक पूज्य माननेवाले, अकड़ रखनेवाले तथा धन और मानके मदमें चूर रहनेवाले वे मनुष्य दम्भसे अविधिपूर्वक नाममात्रके यज्ञोंसे यजन करते हैं।

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ātma-sambhāvitāḥ stabdhā dhana-māna-madānvitāḥ
yajante nāma-yajñais te dambhenāvidhi-pūrvakam

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 17.5 से 17.6 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः।
दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ॥ 17.5 ॥
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः।
मां चैवान्तःशरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान् ॥ 17.6 ॥

हिंदी अर्थजो मनुष्य शास्त्रविधिसे रहित घोर तप करते हैं; जो दम्भ और अहङ्कारसे अच्छी तरह युक्त हैं; जो भोग-पदार्थ, आसक्ति और हठसे युक्त हैं; जो शरीरमें स्थित पाँच भूतोंको अर्थात् पाञ्चभौतिक शरीरको तथा अन्तःकरणमें स्थित मुझ परमात्माको भी कृश करनेवाले हैं उन अज्ञानियोंको तू आसुर निश्चयवाले (आसुरी सम्पदावाले) समझ।

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aśhāstra-vihitaṁ ghoraṁ tapyante ye tapo janāḥ
dambhāhankāra-sanyuktāḥ kāma-rāga-balānvitāḥ
karṣhayantaḥ śharīra-sthaṁ bhūta-grāmam achetasaḥ
māṁ chaivāntaḥ śharīra-sthaṁ tān viddhy āsura-niśhchayān

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 18.16 श्रीकृष्ण

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ॥

हिंदी अर्थपरन्तु ऐसे पाँच हेतुओंके होनेपर भी जो उस (कर्मोंके) विषयमें केवल (शुद्ध) आत्माको कर्ता मानता है, वह दुर्मति ठीक नहीं समझता; क्योंकि उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं है।

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tatraivaṁ sati kartāram ātmānaṁ kevalaṁ tu yaḥ
paśhyaty akṛita-buddhitvān na sa paśhyati durmatiḥ

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.17 श्रीकृष्ण

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते।
हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥

हिंदी अर्थजिसका अहंकृतभाव नहीं है और जिसकी बुद्धि लिप्त नहीं होती, वह इन सम्पूर्ण प्राणियोंको मारकर भी न मारता है और न बँधता है।

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yasya nāhankṛito bhāvo buddhir yasya na lipyate
hatvā ‘pi sa imāl lokān na hanti na nibadhyate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.24 श्रीकृष्ण

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहङ्कारेण वा पुनः।
क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहृतम् ॥

हिंदी अर्थपरन्तु जो कर्म भोगोंको चाहनेवाले मनुष्यके द्वारा अहंकार अथवा परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कहा गया है।

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yat tu kāmepsunā karma sāhankāreṇa vā punaḥ
kriyate bahulāyāsaṁ tad rājasam udāhṛitam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.59 श्रीकृष्ण

यदहङ्कारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे।
मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥

हिंदी अर्थअहंकारका आश्रय लेकर तू जो ऐसा मान रहा है कि मैं युद्ध नहीं करूँगा, तेरा यह निश्चय मिथ्या (झूठा) है; क्योंकि तेरी क्षात्र-प्रकृति तेरेको युद्धमें लगा देगी।

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yad ahankāram āśhritya na yotsya iti manyase
mithyaiṣha vyavasāyas te prakṛitis tvāṁ niyokṣhyati

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 5.8 से 5.9 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्त्ववित्।
पश्यन् श्रृणवन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्गच्छन्स्वपन् श्वसन् ॥ 5.8 ॥
प्रलपन्विसृजन्गृह्णन्नुन्मिषन्निमिषन्नपि।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेषु वर्तन्त इति धारयन् ॥ 5.9 ॥

हिंदी अर्थतत्त्वको जाननेवाला सांख्ययोगी देखता, सुनता, छूता, सूँघता, खाता, चलता, ग्रहण करता, बोलता, मल-मूत्र का त्याग करता, सोता, श्वास लेता तथा आँखें खोलता और मूँदता भी सम्पूर्ण इन्द्रियाँ इन्द्रियोंके विषयोंमें बरत रही हैं' -- ऐसा समझकर 'मैं (स्वयं) कुछ भी नहीं करता हूँ' -- ऐसा माने।

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naiva kiñchit karomīti yukto manyeta tattva-vit
paśhyañ śhṛiṇvan spṛiśhañjighrann aśhnangachchhan svapañśhvasan
pralapan visṛijan gṛihṇann unmiṣhan nimiṣhann api
indriyāṇīndriyārtheṣhu vartanta iti dhārayan
pralapan visṛjan gṛhṇann unmiṣan nimiṣann api indriyāṇīndriyārtheṣu vartanta iti dhārayan

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।