गीता · शांति और सुख
कुंडलीपंचांग

शांति और सुख पर गीता क्या कहती है?

सुकून, संतोष, खुशी

गीता कहती है कि जो कामना, ममता और अहंकार छोड़ देता है, वही शांति पाता है (2.71) — और शांति के बिना सुख कहाँ (2.66)?

10श्लोक
5अध्याय से
गीता 2.71 श्रीकृष्ण

विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥

हिंदी अर्थजो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है।

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vihāya kāmān yaḥ sarvān pumānśh charati niḥspṛihaḥ
nirmamo nirahankāraḥ sa śhāntim adhigachchhati

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.66 श्रीकृष्ण

नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥

हिंदी अर्थजिसके मन-इन्द्रियाँ संयमित नहीं हैं, ऐसे मनुष्यकी व्यवसायात्मिका बुद्धि नहीं होती और व्यवसायात्मिका बुद्धि न होनेसे उसमें कर्तव्यपरायणताकी भावना नहीं होती। ऐसी भावना न होनेसे उसको शान्ति नहीं मिलती। फिर शान्तिरहित मनुष्यको सुख कैसे मिल सकता है?

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nāsti buddhir-ayuktasya na chāyuktasya bhāvanā
na chābhāvayataḥ śhāntir aśhāntasya kutaḥ sukham

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.70 श्रीकृष्ण

आपूर्यमाणमचलप्रतिष्ठं
समुद्रमापः प्रविशन्ति यद्वत्।
तद्वत्कामा यं प्रविशन्ति सर्वे
स शान्तिमाप्नोति न कामकामी ॥

हिंदी अर्थजैसे सम्पूर्ण नदियोंका जल चारों ओरसे जलद्वारा परिपूर्ण समुद्रमें आकर मिलता है, पर समुद्र अपनी मर्यादामें अचल प्रतिष्ठित रहता है ऐसे ही सम्पूर्ण भोग-पदार्थ जिस संयमी मनुष्य को विकार उत्पन्न किये बिना ही उसको प्राप्त होते हैं, वही मनुष्य परमशान्तिको प्राप्त होता है, भोगोंकी कामनावाला नहीं।

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āpūryamāṇam achala-pratiṣhṭhaṁ
samudram āpaḥ praviśhanti yadvat
tadvat kāmā yaṁ praviśhanti sarve
sa śhāntim āpnoti na kāma-kāmī

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.55 श्रीकृष्ण

प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान्।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जिस कालमें साधक मनोगत सम्पूर्ण कामनाओंका अच्छी तरह त्याग कर देता है और अपने-आपसे अपने-आपमें ही सन्तुष्ट रहता है, उस कालमें वह स्थितप्रज्ञ कहा जाता है।

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śhrī bhagavān uvācha
prajahāti yadā kāmān sarvān pārtha mano-gatān
ātmany-evātmanā tuṣhṭaḥ sthita-prajñas tadochyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 3.17 श्रीकृष्ण

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥

हिंदी अर्थजो मनुष्य अपने-आपमें ही रमण करनेवाला और अपने-आपमें ही तृप्त तथा अपने-आपमें ही संतुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य नहीं है।

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yas tvātma-ratir eva syād ātma-tṛiptaśh cha mānavaḥ
ātmanyeva cha santuṣhṭas tasya kāryaṁ na vidyate

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 5.12 श्रीकृष्ण

युक्तः कर्मफलं त्यक्त्वा शान्तिमाप्नोति नैष्ठिकीम्।
अयुक्तः कामकारेण फले सक्तो निबध्यते ॥

हिंदी अर्थकर्मयोगी कर्मफलका त्याग करके नैष्ठिकी शान्तिको प्राप्त होता है। परन्तु सकाम मनुष्य कामनाके कारण फलमें आसक्त होकर बँध जाता है।

रोमन में पढ़ें

yuktaḥ karma-phalaṁ tyaktvā śhāntim āpnoti naiṣhṭhikīm
ayuktaḥ kāma-kāreṇa phale sakto nibadhyate

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 5.24 श्रीकृष्ण

योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥

हिंदी अर्थजो मनुष्य केवल परमात्मामें सुखवाला है और केवल परमात्मामें रमण करनेवाला है तथा जो केवल परमात्मामें ज्ञानवाला है, वह ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव करनेवाला सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है।

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yo 'ntaḥ-sukho 'ntar-ārāmas tathāntar-jyotir eva yaḥ
sa yogī brahma-nirvāṇaṁ brahma-bhūto 'dhigachchhati

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 6.20 श्रीकृष्ण

यत्रोपरमते चित्तं निरुद्धं योगसेवया।
यत्र चैवात्मनाऽऽत्मानं पश्यन्नात्मनि तुष्यति ॥

हिंदी अर्थयोगका सेवन करनेसे जिस अवस्थामें निरुद्ध चित्त उपराम हो जाता है तथा जिस अवस्थामें स्वयं अपने-आप से अपने-आपको देखता हुआ अपने-आपमें ही सन्तुष्ट हो जाता है।

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yatroparamate chittaṁ niruddhaṁ yoga-sevayā
yatra chaivātmanātmānaṁ paśhyann ātmani tuṣhyati

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 2.72 श्रीकृष्ण

एषा ब्राह्मी स्थितिः पार्थ नैनां प्राप्य विमुह्यति।
स्थित्वाऽस्यामन्तकालेऽपि ब्रह्मनिर्वाणमृच्छति ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! यह ब्राह्मी स्थिति है। इसको प्राप्त होकर कभी कोई मोहित नहीं होता। इस स्थितिमें यदि अन्तकालमें भी स्थित हो जाय, तो निर्वाण (शान्त) ब्रह्मकी प्राप्ति हो जाती है।

रोमन में पढ़ें

eṣhā brāhmī sthitiḥ pārtha naināṁ prāpya vimuhyati
sthitvāsyām anta-kāle ’pi brahma-nirvāṇam ṛichchhati

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 18.62 श्रीकृष्ण

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत।
तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥

हिंदी अर्थहे भरतवंशोद्भव अर्जुन ! तू सर्वभावसे उस ईश्वरकी ही शरणमें चला जा। उसकी कृपासे तू परमशान्ति-(संसारसे सर्वथा उपरति-) को और अविनाशी परमपदको प्राप्त हो जायगा।

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tam eva śharaṇaṁ gachchha sarva-bhāvena bhārata
tat-prasādāt parāṁ śhāntiṁ sthānaṁ prāpsyasi śhāśhvatam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।