गीता · मान-अपमान
कुंडलीपंचांग

मान-अपमान पर गीता क्या कहती है?

आलोचना, तारीफ़, इज़्ज़त

निंदा और प्रशंसा दोनों मन पर असर डालती हैं। गीता कहती है कि स्थिर व्यक्ति मान-अपमान और निंदा-स्तुति में सम रहता है।

9श्लोक
5अध्याय से
गीता 6.7 श्रीकृष्ण

जितात्मनः प्रशान्तस्य परमात्मा समाहितः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु तथा मानापमानयोः ॥

हिंदी अर्थजिसने अपने-आपपर अपनी विजय कर ली है, उस शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) सुख-दुःख तथा मान-अपमानमें निर्विकार मनुष्यको परमात्मा नित्यप्राप्त हैं।

रोमन में पढ़ें

jitātmanaḥ praśhāntasya paramātmā samāhitaḥ
śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu tathā mānāpamānayoḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 12.18 से 12.19 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 12.18 ॥
तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ 12.19 ॥

हिंदी अर्थजो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

रोमन में पढ़ें

samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ
śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit
aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 14.24 से 14.25 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ 14.24 ॥
मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ 14.25 ॥

हिंदी अर्थजो धीर मनुष्य सुख-दुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है; जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रिय-अप्रियमें तथा अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है; जो मान-अपमानमें तथा मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

sama-duḥkha-sukhaḥ sva-sthaḥ sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ
tulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-sanstutiḥ
mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāri-pakṣhayoḥ
sarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa uchyate

अध्याय 14 · गुणत्रयविभागयोग
गीता 17.18 श्रीकृष्ण

सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्।
क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम् ॥

हिंदी अर्थजो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा दिखानेके भावसे किया जाता है, वह इस लोकमें अनिश्चित और नाशवान् फल देनेवाला तप राजस कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

satkāra-māna-pūjārthaṁ tapo dambhena chaiva yat
kriyate tad iha proktaṁ rājasaṁ chalam adhruvam

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 2.34 श्रीकृष्ण

अकीर्तिं चापि भूतानि कथयिष्यन्ति तेऽव्ययाम्।
संभावितस्य चाकीर्तिर्मरणादतिरिच्यते ॥

हिंदी अर्थऔर सब प्राणी भी तेरी सदा रहनेवाली अपकीर्तिका कथन अर्थात निंदा करेंगे। वह अपकीर्ति सम्मानित मनुष्यके लिये मृत्युसे भी बढ़कर दुःखदायी होती है।

रोमन में पढ़ें

akīrtiṁ chāpi bhūtāni
kathayiṣhyanti te ’vyayām
sambhāvitasya chākīrtir
maraṇād atirichyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.35 श्रीकृष्ण

भयाद्रणादुपरतं मंस्यन्ते त्वां महारथाः।
येषां च त्वं बहुमतो भूत्वा यास्यसि लाघवम् ॥

हिंदी अर्थमहारथीलोग तुझे भयके कारण युद्धसे उपरत (हटा) हुआ मानेंगे। जिनकी धारणामें तू बहुमान्य हो चुका है, उनकी दृष्टिमें तू लघुताको प्राप्त हो जायगा।

रोमन में पढ़ें

bhayād raṇād uparataṁ mansyante tvāṁ mahā-rathāḥ
yeṣhāṁ cha tvaṁ bahu-mato bhūtvā yāsyasi lāghavam

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.36 श्रीकृष्ण

अवाच्यवादांश्च बहून् वदिष्यन्ति तवाहिताः।
निन्दन्तस्तव सामर्थ्यं ततो दुःखतरं नु किम् ॥

हिंदी अर्थतेरे शत्रुलोग तेरी सार्मथ्यकी निन्दा करते हुए न कहनेयोग्य बहुत-से वचन भी कहेंगे। उससे बढ़कर और दुःखकी बात क्या होगी?

रोमन में पढ़ें

avāchya-vādānśh cha bahūn vadiṣhyanti tavāhitāḥ
nindantastava sāmarthyaṁ tato duḥkhataraṁ nu kim

अध्याय 2 · सांख्ययोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।