गीता · बेचैन मन
कुंडलीपंचांग

बेचैन मन पर गीता क्या कहती है?

भटकाव, ध्यान, एकाग्रता

अर्जुन ने खुद कहा था कि मन को वश में करना वायु को रोकने जैसा कठिन है। गीता इस बात को मानती है और अभ्यास व वैराग्य का रास्ता बताती है — ज़्यादातर श्लोक अध्याय 6 (ध्यान योग) से हैं।

21श्लोक
5अध्याय से
गीता 6.34 अर्जुन

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥

हिंदी अर्थक्योंकि हे कृष्ण ! मन बड़ा ही चञ्चल, प्रमथनशील, दृढ़ (जिद्दी) और बलवान् है। उसका निग्रह करना मैं वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ।

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chañchalaṁ hi manaḥ kṛiṣhṇa pramāthi balavad dṛiḍham
tasyāhaṁ nigrahaṁ manye vāyor iva su-duṣhkaram

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.35 श्रीकृष्ण

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

हिंदी अर्थहे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है।

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śhrī bhagavān uvācha
asanśhayaṁ mahā-bāho mano durnigrahaṁ chalam
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa cha gṛihyate

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.26 श्रीकृष्ण

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

हिंदी अर्थयह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही  लगाये।

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yato yato niśhcharati manaśh chañchalam asthiram
tatas tato niyamyaitad ātmanyeva vaśhaṁ nayet

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.36 श्रीकृष्ण

असंयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः।
वश्यात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः ॥

हिंदी अर्थजिसका मन पूरा वशमें नहीं है, उसके द्वारा योग प्राप्त होना कठिन है। परन्तु उपायपूर्वक यत्न करनेवाले वश्यात्माको योग प्राप्त हो सकता है, ऐसा मेरा मत है।

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asaṅyatātmanā yogo duṣhprāpa iti me matiḥ
vaśhyātmanā tu yatatā śhakyo ’vāptum upāyataḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.19 श्रीकृष्ण

यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥

हिंदी अर्थजैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है।

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yathā dīpo nivāta-stho neṅgate sopamā smṛitā
yogino yata-chittasya yuñjato yogam ātmanaḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.24 श्रीकृष्ण

सङ्कल्पप्रभवान्कामांस्त्यक्त्वा सर्वानशेषतः।
मनसैवेन्द्रियग्रामं विनियम्य समन्ततः ॥

हिंदी अर्थसंकल्पसे उत्पन्न होनेवाली सम्पूर्ण कामनाओंका सर्वथा त्याग करके और मनसे ही इन्द्रिय-समूहको सभी ओरसे हटाकर।

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saṅkalpa-prabhavān kāmāns tyaktvā sarvān aśheṣhataḥ
manasaivendriya-grāmaṁ viniyamya samantataḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.25 श्रीकृष्ण

शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥

हिंदी अर्थधैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे।

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śhanaiḥ śhanair uparamed buddhyā dhṛiti-gṛihītayā
ātma-sansthaṁ manaḥ kṛitvā na kiñchid api chintayet

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 2.67 श्रीकृष्ण

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥

हिंदी अर्थअपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है।

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indriyāṇāṁ hi charatāṁ yan mano ’nuvidhīyate
tadasya harati prajñāṁ vāyur nāvam ivāmbhasi

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.60 श्रीकृष्ण

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥

हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं।

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yatato hyapi kaunteya puruṣhasya vipaśhchitaḥ
indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṁ manaḥ

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 12.8 श्रीकृष्ण

मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय।
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयः ॥

हिंदी अर्थतू मेरेमें मनको लगा और मेरेमें ही बुद्धिको लगा; इसके बाद तू मेरेमें ही निवास करेगा -- इसमें संशय नहीं है।

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mayy eva mana ādhatsva mayi buddhiṁ niveśhaya
nivasiṣhyasi mayy eva ata ūrdhvaṁ na sanśhayaḥ

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 12.9 श्रीकृष्ण

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥

हिंदी अर्थअगर तू मनको मेरेमें अचलभावसे स्थिर (अर्पण) करनेमें समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय ! अभ्यासयोगके द्वारा तू मेरी प्राप्तिकी इच्छा कर।

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atha chittaṁ samādhātuṁ na śhaknoṣhi mayi sthiram
abhyāsa-yogena tato mām ichchhāptuṁ dhanañjaya

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 17.16 श्रीकृष्ण

मनःप्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः।
भावसंशुद्धिरित्येतत्तपो मानसमुच्यते ॥

हिंदी अर्थमनकी प्रसन्नता, सौम्य भाव, मननशीलता, मनका निग्रह और भावोंकी शुद्धि -- इस तरह यह मन-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

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manaḥ-prasādaḥ saumyatvaṁ maunam ātma-vinigrahaḥ
bhāva-sanśhuddhir ity etat tapo mānasam uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 6.10 श्रीकृष्ण

योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः।
एकाकी यतचित्तात्मा निराशीरपरिग्रहः ॥

हिंदी अर्थभोगबुद्धिसे संग्रह न करनेवाला, इच्छारहित और अन्तःकरण तथा शरीरको वशमें रखनेवाला योगी अकेला एकान्तमें स्थित होकर मनको निरन्तर परमात्मामें लगाये।

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yogī yuñjīta satatam ātmānaṁ rahasi sthitaḥ
ekākī yata-chittātmā nirāśhīr aparigrahaḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.11 श्रीकृष्ण

शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥

हिंदी अर्थशुद्ध भूमिपर, जिसपर क्रमशः कुश, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न अत्यन्त ऊँचा है और न अत्यन्त नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिरस्थापन करके।

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śhuchau deśhe pratiṣhṭhāpya sthiram āsanam ātmanaḥ
nātyuchchhritaṁ nāti-nīchaṁ chailājina-kuśhottaram

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.12 श्रीकृष्ण

तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥

हिंदी अर्थउस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे।

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tatraikāgraṁ manaḥ kṛitvā yata-chittendriya-kriyaḥ
upaviśhyāsane yuñjyād yogam ātma-viśhuddhaye

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.13 श्रीकृष्ण

समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥

हिंदी अर्थकाया, शिर और ग्रीवाको सीधे अचल धारण करके तथा दिशाओंको न देखकर केवल अपनी नासिकाके अग्रभागको देखते हुए स्थिर होकर बैठे।

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samaṁ kāya-śhiro-grīvaṁ dhārayann achalaṁ sthiraḥ
samprekṣhya nāsikāgraṁ svaṁ diśhaśh chānavalokayan

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.15 श्रीकृष्ण

युञ्जन्नेवं सदाऽऽत्मानं योगी नियतमानसः।
शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥

हिंदी अर्थनियत  मनवाला योगी मनको इस तरहसे सदा परमात्मामें लगाता हुआ मेरेमें सम्यक् स्थितिवाली जो निर्वाणपरमा शान्ति है, उसको प्राप्त हो जाता है।

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yuñjann evaṁ sadātmānaṁ yogī niyata-mānasaḥ
śhantiṁ nirvāṇa-paramāṁ mat-sansthām adhigachchhati

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 18.33 श्रीकृष्ण

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः।
योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

हिंदी अर्थहे पार्थ ! समतासे युक्त जिस अव्यभिचारिणी धृतिके द्वारा मनुष्य मन, प्राण और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको धारण करता है, वह धृति सात्त्विकी है।

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dhṛityā yayā dhārayate manaḥ-prāṇendriya-kriyāḥ
yogenāvyabhichāriṇyā dhṛitiḥ sā pārtha sāttvikī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.51 से 18.53 श्रीकृष्ण

इन 3 श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

बुद्ध्या विशुद्धया युक्तो धृत्याऽऽत्मानं नियम्य च।
शब्दादीन् विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषौ व्युदस्य च ॥ 18.51 ॥
विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानसः।
ध्यानयोगपरो नित्यं वैराग्यं समुपाश्रितः ॥ 18.52 ॥
अहङ्कारं बलं दर्पं कामं क्रोधं परिग्रहम्।
विमुच्य निर्ममः शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ 18.53 ॥

हिंदी अर्थजो विशुद्ध (सात्त्विकी) बुद्धिसे युक्त, वैराग्यके आश्रित, एकान्तका सेवन करनेवाला और नियमित भोजन करनेवाला साधक धैर्यपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके, शरीर-वाणी-मनको वशमें करके, शब्दादि विषयोंका त्याग करके और राग-द्वेषको छोड़कर निरन्तर ध्यानयोगके परायण हो जाता है, वह अहंकार, बल, दर्प, काम, क्रोध और परिग्रहका त्याग करके एवं निर्मम तथा शान्त होकर ब्रह्मप्राप्तिका पात्र हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

buddhyā viśhuddhayā yukto dhṛityātmānaṁ niyamya cha
śhabdādīn viṣhayāns tyaktvā rāga-dveṣhau vyudasya cha
vivikta-sevī laghv-āśhī yata-vāk-kāya-mānasaḥ
dhyāna-yoga-paro nityaṁ vairāgyaṁ samupāśhritaḥ
ahankāraṁ balaṁ darpaṁ kāmaṁ krodhaṁ parigraham
vimuchya nirmamaḥ śhānto brahma-bhūyāya kalpate

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।