कर्मयोग गीता का केंद्रीय विचार है — काम छोड़ना नहीं, बल्कि आसक्ति छोड़कर पूरी लगन से करना। ज़्यादातर श्लोक अध्याय 2, 3 और 18 से हैं।
20श्लोक
7अध्याय से
गीता 2.47श्रीकृष्ण
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
हिंदी अर्थकर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।
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karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana
mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi
गीता 2.50श्रीकृष्ण
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥
हिंदी अर्थबुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।
हिंदी अर्थइसलिये तू निरन्तर आसक्तिरहित होकर कर्तव्य-कर्मका भलीभाँति आचरण कर; क्योंकि आसक्तिरहित होकर कर्म करता हुआ मनुष्य परमात्माको प्राप्त हो जाता है।
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
हिंदी अर्थमनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको प्राप्त होता है और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धिको ही प्राप्त होता है।
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na karmaṇām anārambhān naiṣhkarmyaṁ puruṣho ’śhnute
na cha sannyasanād eva siddhiṁ samadhigachchhati
गीता 3.5श्रीकृष्ण
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः ॥
हिंदी अर्थकोई भी मनुष्य किसी भी अवस्थामें क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता; क्योंकि (प्रकृतिके) परवश हुए सब प्राणियोंसे प्रकृतिजन्य गुण कर्म कराते हैं।
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na hi kaśhchit kṣhaṇam api jātu tiṣhṭhatyakarma-kṛit
kāryate hyavaśhaḥ karma sarvaḥ prakṛiti-jair guṇaiḥ
गीता 3.7श्रीकृष्ण
यस्त्विन्द्रियाणि मनसा नियम्यारभतेऽर्जुन।
कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते ॥
हिंदी अर्थहे अर्जुन! जो मनुष्य मनसे इन्द्रियोंपर नियन्त्रण करके आसक्तिरहित होकर (निष्काम भावसे) समस्त इन्द्रियोंके द्वारा कर्मयोगका आचरण करता है, वही श्रेष्ठ है।
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yas tvindriyāṇi manasā niyamyārabhate ’rjuna
karmendriyaiḥ karma-yogam asaktaḥ sa viśhiṣhyate
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
हिंदी अर्थकर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।
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śhrī bhagavān uvācha
anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ
sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ
हिंदी अर्थहे पार्थ ! (पूर्वोक्त यज्ञ, दान और तप -- ) इन कर्मोंको तथा दूसरे भी कर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके करना चाहिये -- यह मेरा निश्चित किया हुआ उत्तम मत है।
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etāny api tu karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā phalāni cha
kartavyānīti me pārtha niśhchitaṁ matam uttamam
हिंदी अर्थजो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तृत्वाभिमानसे रहित हो तथा फलेच्छारहित मनुष्यके द्वारा बिना राग-द्वेषके किया हुआ हो, वह सात्त्विक कहा जाता है।
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niyataṁ saṅga-rahitam arāga-dveṣhataḥ kṛitam
aphala-prepsunā karma yat tat sāttvikam uchyate
हिंदी अर्थअपने-अपने कर्ममें तत्परतापूर्वक लगा हुआ मनुष्य सम्यक् सिद्धि-(परमात्मा-)को प्राप्त कर लेता है। अपने कर्ममें लगा हुआ मनुष्य जिस प्रकार सिद्धिको प्राप्त होता है? उस प्रकारको तू मेरेसे सुन।
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sve sve karmaṇy abhirataḥ sansiddhiṁ labhate naraḥ
sva-karma-nirataḥ siddhiṁ yathā vindati tach chhṛiṇu
हिंदी अर्थजिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।