पूरी गीता अर्जुन के “विषाद” यानी गहरी उदासी से शुरू होती है। ये श्लोक बताते हैं कि सुख-दुःख आते-जाते हैं, और मन की प्रसन्नता से सब दुःख मिटने लगते हैं (2.65)।
12श्लोक
5अध्याय से
गीता 2.14श्रीकृष्ण
मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥
हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं, वो तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) - के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आने-जानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! उनको तुम सहन करो।
रोमन में पढ़ें
mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ
āgamāpāyino ’nityās tans-titikṣhasva bhārata
हिंदी अर्थवशीभूत अन्तःकरणवाला कर्मयोगी साधक रागद्वेषसे रहित अपने वशमें की हुई इन्द्रियोंके द्वारा विषयोंका सेवन करता हुआ अन्तःकरणकी निर्मलता को प्राप्त हो जाता है। निर्मलता प्राप्त होनेपर साधकके सम्पूर्ण दुःखोंका नाश हो जाता है और ऐसे शुद्ध चित्तवाले साधककी बुद्धि निःसन्देह बहुत जल्दी परमात्मामें स्थिर हो जाती है।
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥
हिंदी अर्थजिसमें दुःखोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको 'योग' नामसे जानना चाहिये। (वह योग जिस ध्यानयोगका लक्ष्य है,) उस ध्यानयोगका अभ्यास न उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना चाहिये।
रोमन में पढ़ें
taṁ vidyād duḥkha-sanyoga-viyogaṁ yogasaṅjñitam
sa niśhchayena yoktavyo yogo ’nirviṇṇa-chetasā
हिंदी अर्थजिस लाभकी प्राप्ति होनेपर उससे अधिक कोई दूसरा लाभ उसके माननेमें भी नहीं आता और जिसमें स्थित होनेपर वह बड़े भारी दुःखसे भी विचलित नहीं किया जा सकता।
बाह्यस्पर्शेष्वसक्तात्मा विन्दत्यात्मनि यत्सुखम्।
स ब्रह्मयोगयुक्तात्मा सुखमक्षयमश्नुते ॥
हिंदी अर्थबाह्यस्पर्शमें आसक्तिरहित अन्तःकरणवाला साधक आत्मामें जो सुख है, उसको प्राप्त होता है। फिर वह ब्रह्ममें अभिन्नभावसे स्थित मनुष्य अक्षय सुखका अनुभव करता है।
रोमन में पढ़ें
bāhya-sparśheṣhvasaktātmā vindatyātmani yat sukham
sa brahma-yoga-yuktātmā sukham akṣhayam aśhnute
गीता 6.21श्रीकृष्ण
सुखमात्यन्तिकं यत्तद्बुद्धिग्राह्यमतीन्द्रियम्।
वेत्ति यत्र न चैवायं स्थितश्चलति तत्त्वतः ॥
हिंदी अर्थजो सुख आत्यन्तिक, अतीन्द्रिय और बुद्धिग्राह्य है, उस सुखका जिस अवस्थामें अनुभव करता है और जिस सुखमें स्थित हुआ यह ध्यानयोगी फिर कभी तत्त्वसे विचलित नहीं होता।
रोमन में पढ़ें
sukham ātyantikaṁ yat tad buddhi-grāhyam atīndriyam
vetti yatra na chaivāyaṁ sthitaśh chalati tattvataḥ
हिंदी अर्थजिसके सब पाप नष्ट हो गये हैं, जिसका रजोगुण तथा मन सर्वथा शान्त(निर्मल) हो गया है, ऐसे इस ब्रह्मस्वरूप योगीको निश्चित ही उत्तम (सात्त्विक) सुख प्राप्त होता है।
हिंदी अर्थहे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुन ! अब तीन प्रकारके सुखको भी तुम मेरेसे सुनो। जिसमें अभ्याससे रमण होता है और जिससे दुःखोंका अन्त हो जाता है, ऐसा वह परमात्मविषयक बुद्धिकी प्रसन्नतासे पैदा होनेवाला जो सुख (सांसारिक आसक्तिके कारण) आरम्भमें विषकी तरह और परिणाममें अमृतकी तरह होता है, वह सुख सात्त्विक कहा गया है।
रोमन में पढ़ें
sukhaṁ tv idānīṁ tri-vidhaṁ śhṛiṇu me bharatarṣhabha
abhyāsād ramate yatra duḥkhāntaṁ cha nigachchhati
yat tad agre viṣham iva pariṇāme ‘mṛitopamam
tat sukhaṁ sāttvikaṁ proktam ātma-buddhi-prasāda-jam
yat tad agre viṣam iva pariṇāme 'mṛtopamam tat sukhaṁ sāttvikaṁ proktam ātma-buddhi-prasāda-jam
हिंदी अर्थहे पार्थ ! मेरेमें आविष्ट चित्तवाले उन भक्तोंका मैं मृत्युरूप संसार-समुद्रसे शीघ्र ही उद्धार करनेवाला बन जाता हूँ।
रोमन में पढ़ें
teṣhām ahaṁ samuddhartā mṛityu-saṁsāra-sāgarāt
bhavāmi na chirāt pārtha mayy āveśhita-chetasām
गीता 18.54श्रीकृष्ण
ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति।
समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥
हिंदी अर्थवह ब्रह्मभूत-अवस्थाको प्राप्त प्रसन्न मनवाला साधक न तो किसीके लिये शोक करता है और न किसीकी इच्छा करता है। ऐसा सम्पूर्ण प्राणियोंमें समभाववाला साधक मेरी पराभक्तिको प्राप्त हो जाता है।
रोमन में पढ़ें
brahma-bhūtaḥ prasannātmā na śhochati na kāṅkṣhati
samaḥ sarveṣhu bhūteṣhu mad-bhaktiṁ labhate parām