गीता · दुविधा
कुंडलीपंचांग

दुविधा पर गीता क्या कहती है?

उलझन, सही-गलत, फ़ैसला

गीता की शुरुआत ही एक बड़े निर्णय-संकट से होती है। अर्जुन पूछते हैं “मेरे लिए क्या श्रेष्ठ है?” — और उत्तर में विवेक और स्वधर्म का रास्ता मिलता है।

17श्लोक
6अध्याय से
गीता 2.7 अर्जुन

कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥

हिंदी अर्थकायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।

रोमन में पढ़ें

kārpaṇya-doṣhopahata-svabhāvaḥ
pṛichchhāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-chetāḥ
yach-chhreyaḥ syānniśhchitaṁ brūhi tanme
śhiṣhyaste ’haṁ śhādhi māṁ tvāṁ prapannam

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.6 अर्जुन

न चैतद्विद्मः कतरन्नो गरीयो
यद्वा जयेम यदि वा नो जयेयुः।
यानेव हत्वा न जिजीविषाम
स्तेऽवस्थिताः प्रमुखे धार्तराष्ट्राः ॥

हिंदी अर्थहम यह भी नहीं जानते कि हमलोगोंके लिये युद्ध करना और न करना - इन दोनोंमेंसे कौन-सा अत्यन्त श्रेष्ठ है; और हमें इसका भी पता नहीं है कि हम उन्हें जीतेंगे अथवा वे हमें जीतेंगे। जिनको मारकर हम जीना भी नहीं चाहते, वे ही धृतराष्ट्रके सम्बन्धी हमारे सामने खड़े हैं।

रोमन में पढ़ें

na chaitadvidmaḥ kataranno garīyo
yadvā jayema yadi vā no jayeyuḥ
yāneva hatvā na jijīviṣhāmas
te ’vasthitāḥ pramukhe dhārtarāṣhṭrāḥ

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 3.1 से 3.2 अर्जुन

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव ॥ 3.1 ॥
व्यामिश्रेणेव वाक्येन बुद्धिं मोहयसीव मे।
तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोऽहमाप्नुयाम् ॥ 3.2 ॥

हिंदी अर्थहे जनार्दन! अगर आप कर्मसे बुद्धि- (ज्ञान-) को श्रेष्ठ मानते हैं, तो फिर हे केशव ! मुझे घोर कर्ममें क्यों लगाते हैं ? आप अपने मिले हुए-से वचनोंसे मेरी बुद्धिको मोहित-सी कर रहे हैं। अतः आप निश्चय करके उस एक बात को कहिये, जिससे मैं कल्याणको प्राप्त हो जाऊँ।

रोमन में पढ़ें

arjuna uvācha
jyāyasī chet karmaṇas te matā buddhir janārdana
tat kiṁ karmaṇi ghore māṁ niyojayasi keśhava
vyāmiśhreṇeva vākyena buddhiṁ mohayasīva me
tad ekaṁ vada niśhchitya yena śhreyo ’ham āpnuyām

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 5.1 अर्जुन

संन्यासं कर्मणां कृष्ण पुनर्योगं च शंससि।
यच्छ्रेय एतयोरेकं तन्मे ब्रूहि सुनिश्चितम् ॥

हिंदी अर्थहे कृष्ण ! आप कर्मोंका स्वरूपसे त्याग करनेकी और फिर कर्मयोगकी प्रशंसा करते हैं। अतः इन दोनों साधनोंमें जो एक निश्चितरूपसे कल्याणकारक हो, उसको मेरे लिये कहिये।

रोमन में पढ़ें

arjuna uvācha
sannyāsaṁ karmaṇāṁ kṛiṣhṇa punar yogaṁ cha śhansasi
yach chhreya etayor ekaṁ tan me brūhi su-niśhchitam

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 2.41 श्रीकृष्ण

व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।
बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् ॥

हिंदी अर्थहे कुरुनन्दन! इस समबुद्धिकी प्राप्तिके विषयमें व्यवसायात्मिका बुद्धि एक ही होती है। अव्यवसायी मनुष्योंकी बुद्धियाँ अनन्त और बहुशाखाओंवाली ही होती हैं।

रोमन में पढ़ें

vyavasāyātmikā buddhir ekeha kuru-nandana
bahu-śhākhā hyanantāśh cha buddhayo ’vyavasāyinām

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 4.16 श्रीकृष्ण

किं कर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः।
तत्ते कर्म प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ॥

हिंदी अर्थकर्म क्या है और अकर्म क्या है -- इस प्रकार इस विषयमें विद्वान् भी मोहित हो जाते हैं। अतः वह कर्म-तत्त्व मैं तुम्हें भलीभाँति कहूँगा, जिसको जानकर तू अशुभ- (संसार-बन्धन-) से मुक्त हो जायगा।

रोमन में पढ़ें

kiṁ karma kim akarmeti kavayo ’pyatra mohitāḥ
tat te karma pravakṣhyāmi yaj jñātvā mokṣhyase ’śhubhāt

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 3.35 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 18.47 श्रीकृष्ण

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।

रोमन में पढ़ें

śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
svabhāva-niyataṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.30 श्रीकृष्ण

प्रवृत्तिं च निवृत्तिं च कार्याकार्ये भयाभये।
बन्धं मोक्षं च या वेत्ति बुद्धिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो बुद्धि प्रवृत्ति और निवृत्तिको, कर्तव्य और अकर्तव्यको, भय और अभयको तथा बन्धन और मोक्षको जानती है, वह बुद्धि सात्त्विकी है।

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pravṛittiṁ cha nivṛittiṁ cha kāryākārye bhayābhaye
bandhaṁ mokṣhaṁ cha yā vetti buddhiḥ sā pārtha sāttvikī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.31 श्रीकृष्ण

यया धर्ममधर्मं च कार्यं चाकार्यमेव च।
अयथावत्प्रजानाति बुद्धिः सा पार्थ राजसी ॥

हिंदी अर्थहे पार्थ ! मनुष्य जिसके द्वारा धर्म और अधर्मको, कर्तव्य और अकर्तव्यको भी ठीक तरहसे नहीं जानता, वह बुद्धि राजसी है।

रोमन में पढ़ें

yayā dharmam adharmaṁ cha kāryaṁ chākāryam eva cha
ayathāvat prajānāti buddhiḥ sā pārtha rājasī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.32 श्रीकृष्ण

अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसाऽऽवृता।
सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्धिः सा पार्थ तामसी ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! तमोगुणसे घिरी हुई जो बुद्धि अधर्मको धर्म और सम्पूर्ण चीजोंको उलटा मान लेती है, वह तामसी है।

रोमन में पढ़ें

adharmaṁ dharmam iti yā manyate tamasāvṛitā
sarvārthān viparītānśh cha buddhiḥ sā pārtha tāmasī

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 2.52 श्रीकृष्ण

यदा ते मोहकलिलं बुद्धिर्व्यतितरिष्यति।
तदा गन्तासि निर्वेदं श्रोतव्यस्य श्रुतस्य च ॥

हिंदी अर्थजिस समय तेरी बुद्धि मोहरूपी दलदलको तर जायगी, उसी समय तू सुने हुए और सुननेमें आनेवाले भोगोंसे वैराग्यको प्राप्त हो जायगा।

रोमन में पढ़ें

yadā te moha-kalilaṁ buddhir vyatitariṣhyati
tadā gantāsi nirvedaṁ śhrotavyasya śhrutasya cha

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.53 श्रीकृष्ण

श्रुतिविप्रतिपन्ना ते यदा स्थास्यति निश्चला।
समाधावचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि ॥

हिंदी अर्थजिस कालमें शास्त्रीय मतभेदोंसे विचलित हुई तेरी बुद्धि निश्चल हो जायगी और परमात्मामें अचल हो जायगी, उस कालमें तू योगको प्राप्त हो जायगा।

रोमन में पढ़ें

śhruti-vipratipannā te yadā sthāsyati niśhchalā
samādhāv-achalā buddhis tadā yogam avāpsyasi

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 16.24 श्रीकृष्ण

तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ।
ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि ॥

हिंदी अर्थअतः तेरे लिये कर्तव्य-अकर्तव्यकी व्यवस्थामें शास्त्र ही प्रमाण है -- ऐसा जानकर तू इस लोकमें शास्त्र-विधिसे नियत कर्तव्य कर्म करनेयोग्य है।

रोमन में पढ़ें

tasmāch chhāstraṁ pramāṇaṁ te kāryākārya-vyavasthitau
jñātvā śhāstra-vidhānoktaṁ karma kartum ihārhasi

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता 18.63 श्रीकृष्ण

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥

हिंदी अर्थयह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।

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iti te jñānam ākhyātaṁ guhyād guhyataraṁ mayā
vimṛiśhyaitad aśheṣheṇa yathechchhasi tathā kuru

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 18.73 अर्जुन

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत।
स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥

हिंदी अर्थहे अच्युत ! आपकी कृपासे मेरा मोह नष्ट हो गया है और स्मृति प्राप्त हो गयी है। मैं सन्देहरहित होकर स्थित हूँ। अब मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगा।

रोमन में पढ़ें

arjuna uvācha
naṣhṭo mohaḥ smṛitir labdhā tvat-prasādān mayāchyuta
sthito ‘smi gata-sandehaḥ kariṣhye vachanaṁ tava

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

दूसरे विषय

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हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।