गीता · नेतृत्व
कुंडलीपंचांग

नेतृत्व पर गीता क्या कहती है?

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“श्रेष्ठ मनुष्य जो आचरण करता है, दूसरे वैसा ही करते हैं” (3.21) — गीता बताती है कि आगे रहने वाले की ज़िम्मेदारी अपने आचरण से रास्ता दिखाने की है।

10श्लोक
3अध्याय से
गीता 3.21 श्रीकृष्ण

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

हिंदी अर्थश्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण  देता है,  दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।

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yad yad ācharati śhreṣhṭhas tat tad evetaro janaḥ
sa yat pramāṇaṁ kurute lokas tad anuvartate

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.20 श्रीकृष्ण

कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि ॥

हिंदी अर्थराजा जनक-जैसे अनेक महापुरुष भी कर्मके द्वारा ही परमसिद्धिको प्राप्त हुए हैं। इसलिये लोकसंग्रहको देखते हुए भी तू (निष्कामभावसे) कर्म करनेके योग्य है।

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karmaṇaiva hi sansiddhim āsthitā janakādayaḥ
loka-saṅgraham evāpi sampaśhyan kartum arhasi

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.22 श्रीकृष्ण

न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन।
नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि ॥

हिंदी अर्थहे पार्थ! मुझे तीनों लोकोंमें न तो कुछ कर्तव्य है और न कोई प्राप्त करनेयोग्य वस्तु अप्राप्त है, फिर भी मैं कर्तव्यकर्ममें ही लगा रहता हूँ।

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na me pārthāsti kartavyaṁ triṣhu lokeṣhu kiñchana
nānavāptam avāptavyaṁ varta eva cha karmaṇi

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.23 से 3.24 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥ 3.23 ॥
उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम्।
सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः ॥ 3.24 ॥

हिंदी अर्थहे पार्थ! अगर मैं किसी समय सावधान होकर कर्तव्यकर्म न करूँ तो बड़ी हानि हो जाय; क्योंकि मनुष्य सब प्रकारसे मेरे ही मार्गका अनुसरण करते हैं। यदि मैं कर्म न करूँ, तो ये सब मनुष्य नष्ट-भ्रष्ट हो जायँ और मैं वर्णसंकरताको करनेवाला होऊँ तथा इस समस्त प्रजाको नष्ट करनेवाला बनूँ।

रोमन में पढ़ें

yadi hyahaṁ na varteyaṁ jātu karmaṇyatandritaḥ
mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ
utsīdeyur ime lokā na kuryāṁ karma ched aham
sankarasya cha kartā syām upahanyām imāḥ prajāḥ

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.25 से 3.26 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत।
कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥ 3.25 ॥
न बुद्धिभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम्।
जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन् ॥ 3.26 ॥

हिंदी अर्थहे भरतवंशोद्भव अर्जुन! कर्ममें आसक्त हुए अज्ञानीजन जिस प्रकार कर्म करते हैं, आसक्तिरहित विद्वान भी लोकसंग्रह करना चाहता हुआ उसी प्रकार कर्म करे।  तत्त्वज्ञ महापुरुष कर्मोंमें आसक्तिवाले अज्ञानी मनुष्योंकी बुद्धिमें भ्रम उत्पन्न न करे, प्रत्युत स्वयं समस्त कर्मोंको अच्छी तरहसे करता हुआ उनसे भी वैसे ही करवाये।

रोमन में पढ़ें

saktāḥ karmaṇyavidvānso yathā kurvanti bhārata
kuryād vidvāns tathāsaktaśh chikīrṣhur loka-saṅgraham
na buddhi-bhedaṁ janayed ajñānāṁ karma-saṅginām
joṣhayet sarva-karmāṇi vidvān yuktaḥ samācharan

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 3.29 श्रीकृष्ण

प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु।
तानकृत्स्नविदो मन्दान्कृत्स्नविन्न विचालयेत् ॥

हिंदी अर्थप्रकृतिजन्य गुणोंसे अत्यन्त मोहित हुए अज्ञानी मनुष्य गुणों और कर्मोंमें आसक्त रहते हैं। उन पूर्णतया न समझनेवाले मन्दबुद्धि अज्ञानियोंको पूर्णतया जाननेवाला ज्ञानी मनुष्य विचलित न करे।

रोमन में पढ़ें

prakṛiter guṇa-sammūḍhāḥ sajjante guṇa-karmasu
tān akṛitsna-vido mandān kṛitsna-vin na vichālayet

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 10.38 श्रीकृष्ण

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्।
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् ॥

हिंदी अर्थदमन करनेवालोंमें दण्डनीति और विजय चाहनेवालोंमें नीति मैं हूँ। गोपनीय भावोंमें मौन और ज्ञानवानोंमें ज्ञान मैं हूँ।

रोमन में पढ़ें

daṇḍo damayatām asmi nītir asmi jigīṣhatām
maunaṁ chaivāsmi guhyānāṁ jñānaṁ jñānavatām aham

अध्याय 10 · विभूतियोग
गीता 18.78 संजय

यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम।।18.78।

हिंदी अर्थजहाँ योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधनुषधारी अर्जुन हैं, वहाँ ही श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है -- ऐसा मेरा मत है।

रोमन में पढ़ें

yatra yogeśhvaraḥ kṛiṣhṇo yatra pārtho dhanur-dharaḥ
tatra śhrīr vijayo bhūtir dhruvā nītir matir mama

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।