गीता · श्रद्धा और संशय
कुंडलीपंचांग

श्रद्धा और संशय पर गीता क्या कहती है?

शक, विश्वास, आस्था

गीता कहती है — मनुष्य श्रद्धामय है, जिसकी जैसी श्रद्धा, वैसा ही वह है (17.3)। संशय को ज्ञान की तलवार से काटने की बात भी यहीं है (4.42)।

10श्लोक
4अध्याय से
गीता 17.3 श्रीकृष्ण

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥

हिंदी अर्थहे भारत ! सभी मनुष्योंकी श्रद्धा अन्तःकरणके अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है। इसलिये जो जैसी श्रद्धावाला है, वही उसका स्वरूप है अर्थात् वही उसकी निष्ठा -- स्थिति है।

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sattvānurūpā sarvasya śhraddhā bhavati bhārata
śhraddhā-mayo ‘yaṁ puruṣho yo yach-chhraddhaḥ sa eva saḥ

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 4.40 श्रीकृष्ण

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥

हिंदी अर्थविवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक  है न परलोक है और न सुख ही है।

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ajñaśh chāśhraddadhānaśh cha sanśhayātmā vinaśhyati
nāyaṁ loko ’sti na paro na sukhaṁ sanśhayātmanaḥ

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 4.42 श्रीकृष्ण

तस्मादज्ञानसंभूतं हृत्स्थं ज्ञानासिनाऽऽत्मनः।
छित्त्वैनं संशयं योगमातिष्ठोत्तिष्ठ भारत ॥

हिंदी अर्थइसलिये हे भरतवंशी अर्जुन ! हृदयमें स्थित इस अज्ञानसे उत्पन्न अपने संशयका ज्ञानरूप तलवारसे छेदन करके योग -(समता-) में स्थित हो जा, (और युद्धके लिये) खड़ा हो जा।

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tasmād ajñāna-sambhūtaṁ hṛit-sthaṁ jñānāsinātmanaḥ
chhittvainaṁ sanśhayaṁ yogam ātiṣhṭhottiṣhṭha bhārata

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 4.41 श्रीकृष्ण

योगसंन्यस्तकर्माणं ज्ञानसंछिन्नसंशयम्।
आत्मवन्तं न कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ॥

हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! योग- (समता-) के द्वारा जिसका सम्पूर्ण कर्मोंसे सम्बन्ध-विच्छेद हो गया है और ज्ञानके द्वारा जिसके सम्पूर्ण संशयोंका नाश हो गया है, ऐसे स्वरूप-परायण मनुष्यको कर्म नहीं बाँधते।

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yoga-sannyasta-karmāṇaṁ jñāna-sañchhinna-sanśhayam
ātmavantaṁ na karmāṇi nibadhnanti dhanañjaya

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 17.1 अर्जुन

ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।
तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः ॥

हिंदी अर्थहे कृष्ण ! जो मनुष्य शास्त्र-विधिका त्याग करके श्रद्धापूर्वक देवता आदिका पूजन करते हैं, उनकी निष्ठा फिर कौन-सी है? सात्त्विकी है अथवा राजसी-तामसी?

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arjuna uvācha
ye śhāstra-vidhim utsṛijya yajante śhraddhayānvitāḥ
teṣhāṁ niṣhṭhā tu kā kṛiṣhṇa sattvam āho rajas tamaḥ

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.2 श्रीकृष्ण

त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां श्रृणु ॥

हिंदी अर्थमनुष्योंकी वह स्वभावसे उत्पन्न हुई श्रद्धा सात्त्विकी तथा राजसी और तामसी -- ऐसे तीन तरहकी ही होती है, उसको तुम मेरेसे सुनो।

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śhrī-bhagavān uvācha
tri-vidhā bhavati śhraddhā dehināṁ sā svabhāva-jā
sāttvikī rājasī chaiva tāmasī cheti tāṁ śhṛiṇu

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.28 श्रीकृष्ण

अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत्।
असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नो इह ॥

हिंदी अर्थहे पार्थ ! अश्रद्धासे किया हुआ हवन, दिया हुआ दान और तपा हुआ तप तथा और भी जो,कुछ किया जाय, वह सब 'असत्' -- ऐसा कहा जाता है। उसका फल न यहाँ होता है, न मरनेके बाद ही होता है अर्थात् उसका कहीं भी सत् फल नहीं होता।

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aśhraddhayā hutaṁ dattaṁ tapas taptaṁ kṛitaṁ cha yat
asad ity uchyate pārtha na cha tat pretya no iha

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 9.3 श्रीकृष्ण

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप।
अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥

हिंदी अर्थहे परंतप! इस धर्मकी महिमापर श्रद्धा न रखनेवाले मनुष्य मेरे प्राप्त न होकर मृत्युरूप संसारके मार्गमें लौटते रहते हैं अर्थात् बार-बार जन्मते-मरते रहते हैं।

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aśhraddadhānāḥ puruṣhā dharmasyāsya parantapa
aprāpya māṁ nivartante mṛityu-samsāra-vartmani

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 7.21 श्रीकृष्ण

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥

हिंदी अर्थजो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ।

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yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhati
tasya tasyāchalāṁ śhraddhāṁ tām eva vidadhāmyaham

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 7.22 श्रीकृष्ण

स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान् ॥

हिंदी अर्थउस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई) श्रद्धासे युक्त होकर वह मनुष्य (सकामभावपूर्वक) उस देवताकी उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है; परन्तु वह कामना-पूर्ति मेरे द्वारा  विहित की हुई होती है।

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sa tayā śhraddhayā yuktas tasyārādhanam īhate
labhate cha tataḥ kāmān mayaiva vihitān hi tān

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग

दूसरे विषय

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हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।