गीता · आत्मविश्वास
कुंडलीपंचांग

आत्मविश्वास पर गीता क्या कहती है?

हिम्मत, साहस, भरोसा

“अपने द्वारा अपना उद्धार करे” — गीता व्यक्ति को ही अपना मित्र और अपना शत्रु बताती है। ये श्लोक मन की दुर्बलता छोड़कर खड़े होने की प्रेरणा देते हैं।

10श्लोक
6अध्याय से
गीता 6.5 श्रीकृष्ण

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

हिंदी अर्थअपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।

रोमन में पढ़ें

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet
ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.6 श्रीकृष्ण

बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥

हिंदी अर्थजिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है।

रोमन में पढ़ें

bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ
anātmanas tu śhatrutve vartetātmaiva śhatru-vat

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 2.3 श्रीकृष्ण

क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन अर्जुन ! इस नपुंसकताको मत प्राप्त हो; क्योंकि तुम्हारेमें यह उचित नहीं है। हे परंतप ! हृदयकी इस तुच्छ दुर्बलताका त्याग करके युद्धके लिये खड़े हो जाओ।

रोमन में पढ़ें

klaibyaṁ mā sma gamaḥ pārtha naitat tvayyupapadyate
kṣhudraṁ hṛidaya-daurbalyaṁ tyaktvottiṣhṭha parantapa

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.2 श्रीकृष्ण

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥

हिंदी अर्थहे अर्जुन! इस विषम अवसरपर तुम्हें यह कायरता कहाँसे प्राप्त हुई, जिसका कि श्रेष्ठ पुरुष सेवन नहीं करते, जो स्वर्गको देनेवाली नहीं है और कीर्ति करनेवाली भी नहीं है।

रोमन में पढ़ें

śhrī bhagavān uvācha
kutastvā kaśhmalamidaṁ viṣhame samupasthitam
anārya-juṣhṭamaswargyam akīrti-karam arjuna

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.37 श्रीकृष्ण

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः ॥

हिंदी अर्थअगर युद्धमें तू मारा जायगा तो तुझे स्वर्गकी प्राप्ति होगी और अगर युद्धमें तू जीत जायगा तो पृथ्वीका राज्य भोगेगा। अतः हे कुन्तीनन्दन! तू युद्धके लिये निश्चय करके खड़ा हो जा।

रोमन में पढ़ें

hato vā prāpsyasi swargaṁ jitvā vā bhokṣhyase mahīm
tasmād uttiṣhṭha kaunteya yuddhāya kṛita-niśhchayaḥ

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 11.33 श्रीकृष्ण

तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व
जित्वा शत्रून् भुङ्क्ष्व राज्यं समृद्धम्।
मयैवैते निहताः पूर्वमेव
निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥

हिंदी अर्थइसलिये तुम युद्धके लिये खड़े हो जाओ और यशको प्राप्त करो तथा शत्रुओंको जीतकर धन-धान्यसे सम्पन्न राज्यको भोगो। ये सभी मेरे द्वारा पहलेसे ही मारे हुए हैं। हे सव्यसाचिन् !  तुम निमित्तमात्र बन जाओ।

रोमन में पढ़ें

tasmāt tvam uttiṣhṭha yaśho labhasva
jitvā śhatrūn bhuṅkṣhva rājyaṁ samṛiddham
mayaivaite nihatāḥ pūrvam eva
nimitta-mātraṁ bhava savya-sāchin

अध्याय 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
गीता 18.43 श्रीकृष्ण

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम्।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ॥

हिंदी अर्थशूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजाके संचालन आदिकी विशेष चतुरता, युद्धमें कभी पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करनेका भाव -- ये सबकेसब क्षत्रियके स्वाभाविक कर्म हैं।

रोमन में पढ़ें

śhauryaṁ tejo dhṛitir dākṣhyaṁ yuddhe chāpy apalāyanam
dānam īśhvara-bhāvaśh cha kṣhātraṁ karma svabhāva-jam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 7.8 श्रीकृष्ण

रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः।
प्रणवः सर्ववेदेषु शब्दः खे पौरुषं नृषु ॥

हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन ! जलोंमें रस मैं हूँ, चन्द्रमा और सूर्यमें प्रभा (प्रकाश) मैं हूँ, सम्पूर्ण वेदोंमें प्रणव (ओंकार) मैं हूँ, आकाशमें शब्द और मनुष्योंमें पुरुषार्थ मैं हूँ।

रोमन में पढ़ें

raso ’ham apsu kaunteya prabhāsmi śhaśhi-sūryayoḥ
praṇavaḥ sarva-vedeṣhu śhabdaḥ khe pauruṣhaṁ nṛiṣhu

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 10.36 श्रीकृष्ण

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्।
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् ॥

हिंदी अर्थछल करनेवालोंमें जूआ और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। जीतनेवालोंकी विजय, निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक मनुष्योंका सात्त्विक भाव मैं हूँ।

रोमन में पढ़ें

dyūtaṁ chhalayatām asmi tejas tejasvinām aham
jayo ’smi vyavasāyo ’smi sattvaṁ sattvavatām aham

अध्याय 10 · विभूतियोग
गीता 10.41 श्रीकृष्ण

यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंऽशसंभवम् ॥

हिंदी अर्थजो-जो ऐश्वर्ययुक्त, शोभायुक्त और बलयुक्त प्राणी तथा वस्तु है, उस-उसको तुम मेरे ही तेज-(योग-) के अंशसे उत्पन्न हुई समझो।

रोमन में पढ़ें

yad yad vibhūtimat sattvaṁ śhrīmad ūrjitam eva vā
tat tad evāvagachchha tvaṁ mama tejo ’nśha-sambhavam

अध्याय 10 · विभूतियोग

दूसरे विषय

सभी जीवन-विषय गीता को अपनी परिस्थिति से पढ़ें

हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है। किस विषय में कौन-से श्लोक हों, यह चयन SachiBhakti का है।