“पढ़ाई में मन नहीं लगता, ऊपर से घर वालों की उम्मीदों का बोझ है — क्या करूँ?”
गीता का छोटा जवाब
मन चंचल है — यह बात अर्जुन ने भी कही थी, और कृष्ण ने माना। पर वे कहते हैं कि अभ्यास से मन वश में होता है। नतीजे के बोझ को थोड़ा उतारिए, रोज़ की दिनचर्या ठीक रखिए, और भटके मन को बार-बार लौटाइए।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
मन भटकना स्वाभाविक है
कृष्ण खुद मानते हैं कि मन बड़ा चंचल है और उसे वश में करना कठिन है — पर अभ्यास और वैराग्य से यह संभव है।
हिंदी अर्थहे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
asanśhayaṁ mahā-bāho mano durnigrahaṁ chalam
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa cha gṛihyate
2
भटके तो लौटा लाइए
मन जहाँ-जहाँ भटके, वहाँ-वहाँ से हटाकर फिर से लगाइए। दस बार भटके तो दस बार लौटाइए — यही अभ्यास है।
हिंदी अर्थजो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।
हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।