जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · मन और सोच

“पढ़ाई में मन नहीं लगता, ऊपर से घर वालों की उम्मीदों का बोझ है — क्या करूँ?”

गीता का छोटा जवाब

मन चंचल है — यह बात अर्जुन ने भी कही थी, और कृष्ण ने माना। पर वे कहते हैं कि अभ्यास से मन वश में होता है। नतीजे के बोझ को थोड़ा उतारिए, रोज़ की दिनचर्या ठीक रखिए, और भटके मन को बार-बार लौटाइए।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. मन भटकना स्वाभाविक है

    कृष्ण खुद मानते हैं कि मन बड़ा चंचल है और उसे वश में करना कठिन है — पर अभ्यास और वैराग्य से यह संभव है।

    गीता 6.35 श्रीकृष्ण

    असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
    अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

    हिंदी अर्थहे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī bhagavān uvācha
    asanśhayaṁ mahā-bāho mano durnigrahaṁ chalam
    abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa cha gṛihyate

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  2. भटके तो लौटा लाइए

    मन जहाँ-जहाँ भटके, वहाँ-वहाँ से हटाकर फिर से लगाइए। दस बार भटके तो दस बार लौटाइए — यही अभ्यास है।

    गीता 6.26 श्रीकृष्ण

    यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
    ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

    हिंदी अर्थयह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही  लगाये।

    रोमन में पढ़ें

    yato yato niśhcharati manaśh chañchalam asthiram
    tatas tato niyamyaitad ātmanyeva vaśhaṁ nayet

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  3. ज्ञान किसे मिलता है

    जो श्रद्धा रखता है, लगन से साधन करता है और इंद्रियों पर संयम रखता है, वही ज्ञान पाता है। पढ़ते समय फ़ोन दूर रखना भी यही संयम है।

    गीता 4.39 श्रीकृष्ण

    श्रद्धावाँल्लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः।
    ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥

    हिंदी अर्थजो जितेन्द्रिय तथा साधन-परायण है, ऐसा श्रद्धावान् मनुष्य ज्ञानको प्राप्त होता है और ज्ञानको प्राप्त होकर वह तत्काल परम शान्तिको प्राप्त हो जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    śhraddhāvān labhate jñānaṁ tat-paraḥ sanyatendriyaḥ
    jñānaṁ labdhvā parāṁ śhāntim achireṇādhigachchhati

    अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
  4. उम्मीदों का बोझ

    सफलता-असफलता में सम रहकर कर्म करो — यही योग है। घर वालों की उम्मीद को डर नहीं, प्रेरणा बनाइए; आपका काम ईमानदार तैयारी है, नतीजे की चिंता नहीं।

    गीता 2.48 श्रीकृष्ण

    योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
    सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

    हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya
    siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  5. दिनचर्या ठीक रखें

    दुख मिटाने वाला योग उसी का सिद्ध होता है जिसका खाना-पीना, सोना-जागना और काम संतुलित हो। रात भर जागकर पढ़ना नहीं, रोज़ थोड़ा-थोड़ा पढ़ना काम आता है।

    गीता 6.17 श्रीकृष्ण

    युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
    युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

    हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।

    रोमन में पढ़ें

    yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu
    yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि कम नंबर आने से आप कम हैं, या पढ़ाई के लिए नींद और सेहत छोड़ दें।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।