जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · मन और सोच

“बिना बात के डर लगता रहता है कि आगे क्या होगा — इससे कैसे निकलूँ?”

गीता का छोटा जवाब

गीता “अभय” को दैवी गुणों में सबसे पहले रखती है। उसका भरोसा है — अच्छे मार्ग पर थोड़ा-सा चलना भी बड़े भय से बचाता है, और जो भगवान पर भरोसा रखता है, उसका योगक्षेम वे स्वयं संभालते हैं।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. अभय पहला दैवी गुण है

    दैवी स्वभाव के गुणों की सूची “अभय” से शुरू होती है — डर से मुक्ति गीता का लक्ष्य है।

    गीता 16.1 श्रीकृष्ण

    अभयं सत्त्वसंशुद्धिः ज्ञानयोगव्यवस्थितिः।
    दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ॥

    हिंदी अर्थभयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī-bhagavān uvācha
    abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ
    dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam

    अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
  2. थोड़ा भी बड़े भय से बचाता है

    इस मार्ग में शुरुआत कभी व्यर्थ नहीं जाती, और थोड़ा-सा भी अभ्यास बड़े भय से रक्षा करता है।

    गीता 2.40 श्रीकृष्ण

    नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
    स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥

    हिंदी अर्थमनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।

    रोमन में पढ़ें

    nehābhikrama-nāśho ’sti pratyavāyo na vidyate
    svalpam apyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  3. आपका ध्यान रखा जा रहा है

    जो अनन्य भाव से भगवान का चिंतन करते हैं, उनका योगक्षेम — जो नहीं है उसे देना और जो है उसकी रक्षा — भगवान स्वयं वहन करते हैं।

    गीता 9.22 श्रीकृष्ण

    अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
    तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

    हिंदी अर्थजो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।

    रोमन में पढ़ें

    ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate
    teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
  4. “चिंता मत करो”

    कृष्ण का अंतिम वचन ही है — मेरी शरण आओ, शोक मत करो।

    गीता 18.66 श्रीकृष्ण

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

    हिंदी अर्थसम्पूर्ण धर्मोंका आश्रय छोड़कर तू केवल मेरी शरणमें आ जा। मैं तुझे सम्पूर्ण पापोंसे मुक्त कर दूँगा, चिन्ता मत कर।

    रोमन में पढ़ें

    sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śharaṇaṁ vraja
    ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣhayiṣhyāmi mā śhuchaḥ

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि डर लगना कमज़ोरी या पाप है। अर्जुन भी काँप रहे थे (1.29); कृष्ण ने उन्हें डाँटा नहीं, समझाया।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।