“बिना बात के डर लगता रहता है कि आगे क्या होगा — इससे कैसे निकलूँ?”
गीता का छोटा जवाब
गीता “अभय” को दैवी गुणों में सबसे पहले रखती है। उसका भरोसा है — अच्छे मार्ग पर थोड़ा-सा चलना भी बड़े भय से बचाता है, और जो भगवान पर भरोसा रखता है, उसका योगक्षेम वे स्वयं संभालते हैं।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
अभय पहला दैवी गुण है
दैवी स्वभाव के गुणों की सूची “अभय” से शुरू होती है — डर से मुक्ति गीता का लक्ष्य है।
हिंदी अर्थभयका सर्वथा अभाव; अन्तःकरणकी शुद्धि; ज्ञानके लिये योगमें दृढ़ स्थिति; सात्त्विक दान; इन्द्रियोंका दमन; यज्ञ; स्वाध्याय; कर्तव्य-पालनके लिये कष्ट सहना; शरीर-मन-वाणीकी सरलता।
रोमन में पढ़ें
śhrī-bhagavān uvācha
abhayaṁ sattva-sanśhuddhir jñāna-yoga-vyavasthitiḥ
dānaṁ damaśh cha yajñaśh cha svādhyāyas tapa ārjavam
2
थोड़ा भी बड़े भय से बचाता है
इस मार्ग में शुरुआत कभी व्यर्थ नहीं जाती, और थोड़ा-सा भी अभ्यास बड़े भय से रक्षा करता है।
गीता 2.40श्रीकृष्ण
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
हिंदी अर्थमनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।
जो अनन्य भाव से भगवान का चिंतन करते हैं, उनका योगक्षेम — जो नहीं है उसे देना और जो है उसकी रक्षा — भगवान स्वयं वहन करते हैं।
गीता 9.22श्रीकृष्ण
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
हिंदी अर्थजो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।
रोमन में पढ़ें
ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate
teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham
4
“चिंता मत करो”
कृष्ण का अंतिम वचन ही है — मेरी शरण आओ, शोक मत करो।