“दूसरों की तरक्की देखकर मन जलता है — यह जलन कैसे जाए?”
गीता का छोटा जवाब
गीता कहती है कि हर किसी का अपना धर्म और अपनी राह है — दूसरे की राह पर चलकर मिली सफलता भी भय वाली होती है। किसी से द्वेष न रखना, सबसे मित्र-भाव — यही भगवान के प्रिय भक्त का पहला लक्षण है।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
आपकी राह आपकी है
दूसरे के धर्म से अपना धर्म श्रेष्ठ है, भले कम गुणों वाला हो। अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करने वाला पाप का भागी नहीं होता।
हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।
हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।
हिंदी अर्थसब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला? मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।
रोमन में पढ़ें
adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha
nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī
3
सबको एक नज़र से देखना
मित्र, शत्रु, तटस्थ, द्वेष करने वाले — सबमें समान बुद्धि रखने वाला श्रेष्ठ है।
गीता 6.9श्रीकृष्ण
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
हिंदी अर्थसुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियोंमें तथा साधु-आचरण करनेवालोंमें और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है।
रोमन में पढ़ें
suhṛin-mitrāryudāsīna-madhyastha-dveṣhya-bandhuṣhu
sādhuṣhvapi cha pāpeṣhu sama-buddhir viśhiṣhyate
4
कामना छूटे तो शांति
जो सब कामनाएँ छोड़कर, बिना लालसा और अहंकार के जीता है, वही शांति पाता है।
गीता 2.71श्रीकृष्ण
विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥
हिंदी अर्थजो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है।