जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · मन और सोच

“दूसरों की तरक्की देखकर मन जलता है — यह जलन कैसे जाए?”

गीता का छोटा जवाब

गीता कहती है कि हर किसी का अपना धर्म और अपनी राह है — दूसरे की राह पर चलकर मिली सफलता भी भय वाली होती है। किसी से द्वेष न रखना, सबसे मित्र-भाव — यही भगवान के प्रिय भक्त का पहला लक्षण है।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. आपकी राह आपकी है

    दूसरे के धर्म से अपना धर्म श्रेष्ठ है, भले कम गुणों वाला हो। अपने स्वभाव के अनुसार कर्म करने वाला पाप का भागी नहीं होता।

    गीता 3.35 श्रीकृष्ण

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
    स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

    हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

    रोमन में पढ़ें

    śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
    swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

    अध्याय 3 · कर्मयोग
    गीता 18.47 श्रीकृष्ण

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
    स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ॥

    हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
    svabhāva-niyataṁ karma kurvan nāpnoti kilbiṣham

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
  2. द्वेष रहित होना पहला लक्षण

    जो किसी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र है, करुणा वाला है — भगवान के प्रिय भक्त के लक्षण यहीं से शुरू होते हैं।

    गीता 12.13 श्रीकृष्ण

    अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
    निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

    हिंदी अर्थसब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला? मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।

    रोमन में पढ़ें

    adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha
    nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī

    अध्याय 12 · भक्तियोग
  3. सबको एक नज़र से देखना

    मित्र, शत्रु, तटस्थ, द्वेष करने वाले — सबमें समान बुद्धि रखने वाला श्रेष्ठ है।

    गीता 6.9 श्रीकृष्ण

    सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
    साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥

    हिंदी अर्थसुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियोंमें तथा साधु-आचरण करनेवालोंमें और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है।

    रोमन में पढ़ें

    suhṛin-mitrāryudāsīna-madhyastha-dveṣhya-bandhuṣhu
    sādhuṣhvapi cha pāpeṣhu sama-buddhir viśhiṣhyate

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  4. कामना छूटे तो शांति

    जो सब कामनाएँ छोड़कर, बिना लालसा और अहंकार के जीता है, वही शांति पाता है।

    गीता 2.71 श्रीकृष्ण

    विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः।
    निर्ममो निरहंकारः स शांतिमधिगच्छति ॥

    हिंदी अर्थजो मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओंका त्याग करके स्पृहारहित, ममतारहित और अहंकाररहित होकर आचरण करता है, वह शान्तिको प्राप्त होता है।

    रोमन में पढ़ें

    vihāya kāmān yaḥ sarvān pumānśh charati niḥspṛihaḥ
    nirmamo nirahankāraḥ sa śhāntim adhigachchhati

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि आगे बढ़ने की इच्छा ही बुरी है। वह तुलना और द्वेष छोड़ने को कहती है, प्रयास छोड़ने को नहीं।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।