रोज़ सोचते हैं कम फ़ोन चलाएँगे, पर रात के 2 बज जाते हैं। आप क्या करेंगे?
बस पाँच मिनट — और फिर घंटे निकल जाते हैं।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता इन्द्रियों की खींच को बहुत गंभीरता से लेती है (2.60, 2.67)। उपाय है अभ्यास — मन जहाँ भटके, वहाँ से धीरे से लौटाना (6.26) — और जीवन में संतुलन (6.17)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. फ़ोन ही छोड़ दूँगा — गीता कहती है कि विषयों से केवल दूर होने से वे छूटते हैं, पर उनका रस नहीं (2.59)। ज़बरदस्ती का त्याग अक्सर लौट आता है।
B. मान लूँगा, यही ज़माना है — गीता 2.67 में कहती है कि भटकती इन्द्रिय मन को वैसे ही हर लेती है जैसे हवा नाव को। “यही ज़माना है” मन को उसी हवा के हवाले करना है।
C. नियम बनाऊँगा, और एक अच्छी आदत जोड़ूँगा — यह गीता के संतुलित — “युक्त” — जीवन के करीब है (6.17), और मन को बार-बार धीरे से लौटाने के अभ्यास के भी (6.26)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
हिंदी अर्थनिराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥
हिंदी अर्थअपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है।
रोमन में पढ़ें
indriyāṇāṁ hi charatāṁ yan mano ’nuvidhīyate
tadasya harati prajñāṁ vāyur nāvam ivāmbhasi
हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।