अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #28 · मन और आदतें आदत बनाम संयम

रोज़ सोचते हैं कम फ़ोन चलाएँगे, पर रात के 2 बज जाते हैं। आप क्या करेंगे?

बस पाँच मिनट — और फिर घंटे निकल जाते हैं।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता इन्द्रियों की खींच को बहुत गंभीरता से लेती है (2.60, 2.67)। उपाय है अभ्यास — मन जहाँ भटके, वहाँ से धीरे से लौटाना (6.26) — और जीवन में संतुलन (6.17)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. फ़ोन ही छोड़ दूँगा — गीता कहती है कि विषयों से केवल दूर होने से वे छूटते हैं, पर उनका रस नहीं (2.59)। ज़बरदस्ती का त्याग अक्सर लौट आता है।

B. मान लूँगा, यही ज़माना है — गीता 2.67 में कहती है कि भटकती इन्द्रिय मन को वैसे ही हर लेती है जैसे हवा नाव को। “यही ज़माना है” मन को उसी हवा के हवाले करना है।

C. नियम बनाऊँगा, और एक अच्छी आदत जोड़ूँगा — यह गीता के संतुलित — “युक्त” — जीवन के करीब है (6.17), और मन को बार-बार धीरे से लौटाने के अभ्यास के भी (6.26)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 2.59 श्रीकृष्ण

विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥

हिंदी अर्थनिराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ
rasa-varjaṁ raso ’pyasya paraṁ dṛiṣhṭvā nivartate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.60 श्रीकृष्ण

यततो ह्यपि कौन्तेय पुरुषस्य विपश्चितः।
इन्द्रियाणि प्रमाथीनि हरन्ति प्रसभं मनः ॥

हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! (रसबुद्धि रहनेसे) यत्न करते हुए विद्वान् मनुष्यकी भी प्रमथनशील इन्द्रियाँ उसके मनको बलपूर्वक हर लेती हैं।

रोमन में पढ़ें

yatato hyapi kaunteya puruṣhasya vipaśhchitaḥ
indriyāṇi pramāthīni haranti prasabhaṁ manaḥ

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.67 श्रीकृष्ण

इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनुविधीयते।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥

हिंदी अर्थअपने-अपने विषयोंमें विचरती हुई इन्द्रियोंमेंसे एक ही इन्द्रिय जिस मनको अपना अनुगामी बना लेती है, वह अकेला मन जलमें नौकाको वायुकी तरह इसकी बुद्धिको हर लेता है।

रोमन में पढ़ें

indriyāṇāṁ hi charatāṁ yan mano ’nuvidhīyate
tadasya harati prajñāṁ vāyur nāvam ivāmbhasi

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 6.26 श्रीकृष्ण

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

हिंदी अर्थयह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही  लगाये।

रोमन में पढ़ें

yato yato niśhcharati manaśh chañchalam asthiram
tatas tato niyamyaitad ātmanyeva vaśhaṁ nayet

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.17 श्रीकृष्ण

युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु।
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा ॥

हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।

रोमन में पढ़ें

yuktāhāra-vihārasya yukta-cheṣhṭasya karmasu
yukta-svapnāvabodhasya yogo bhavati duḥkha-hā

अध्याय 6 · ध्यानयोग

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