“एक बुरी आदत छूटती ही नहीं, बार-बार हार जाता हूँ — क्या करूँ?”
गीता का छोटा जवाब
अर्जुन ने भी यही पूछा था — मनुष्य न चाहते हुए भी गलत काम क्यों करता है? कृष्ण ने जड़ बताई: इच्छा। गीता का रास्ता है — खुद को इंद्रियों से ऊपर पहचानना, केवल रोकना नहीं बल्कि कुछ ऊँचा रस पाना, और हार के बाद भी बार-बार अभ्यास।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
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अर्जुन ने भी यही पूछा था
“मनुष्य न चाहते हुए भी, जैसे कोई ज़बरदस्ती करवा रहा हो, पाप क्यों करता है?” कृष्ण का उत्तर — यह काम (इच्छा) ही है, जो बहुत खाने वाला है और कभी तृप्त नहीं होता।
हिंदी अर्थइन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे भी पर है, वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर - (काम-) को जानकर अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।
रोमन में पढ़ें
indriyāṇi parāṇyāhur indriyebhyaḥ paraṁ manaḥ
manasas tu parā buddhir yo buddheḥ paratas tu saḥ
evaṁ buddheḥ paraṁ buddhvā sanstabhyātmānam ātmanā
jahi śhatruṁ mahā-bāho kāma-rūpaṁ durāsadam
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केवल रोकना काफ़ी नहीं
विषय छोड़ देने पर भी उनका रस बचा रहता है — वह रस तभी जाता है जब कुछ ऊँचा अनुभव मिलता है। आदत की जगह कोई अच्छी चीज़ रखिए: टहलना, भजन, किसी से बात।
हिंदी अर्थनिराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।
हिंदी अर्थहे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
asanśhayaṁ mahā-bāho mano durnigrahaṁ chalam
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa cha gṛihyate
✋ गीता यह नहीं कहती
गीता यह नहीं कहती कि आप बुरे इंसान हैं। नशे की लत हो तो डॉक्टर या नशा-मुक्ति केंद्र की मदद लेना कमज़ोरी नहीं, समझदारी है।