जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · मन और सोच

“एक बुरी आदत छूटती ही नहीं, बार-बार हार जाता हूँ — क्या करूँ?”

गीता का छोटा जवाब

अर्जुन ने भी यही पूछा था — मनुष्य न चाहते हुए भी गलत काम क्यों करता है? कृष्ण ने जड़ बताई: इच्छा। गीता का रास्ता है — खुद को इंद्रियों से ऊपर पहचानना, केवल रोकना नहीं बल्कि कुछ ऊँचा रस पाना, और हार के बाद भी बार-बार अभ्यास।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. अर्जुन ने भी यही पूछा था

    “मनुष्य न चाहते हुए भी, जैसे कोई ज़बरदस्ती करवा रहा हो, पाप क्यों करता है?” कृष्ण का उत्तर — यह काम (इच्छा) ही है, जो बहुत खाने वाला है और कभी तृप्त नहीं होता।

    गीता 3.36 अर्जुन

    अथ केन प्रयुक्तोऽयं पापं चरति पूरुषः।
    अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः ॥

    हिंदी अर्थहे वार्ष्णेय ! फिर यह मनुष्य न चाहता हुआ भी जबर्दस्ती लगाये हुएकी तरह किससे प्रेरित होकर पापका आचरण करता है?

    रोमन में पढ़ें

    arjuna uvācha
    atha kena prayukto ’yaṁ pāpaṁ charati pūruṣhaḥ
    anichchhann api vārṣhṇeya balād iva niyojitaḥ

    अध्याय 3 · कर्मयोग
    गीता 3.37 श्रीकृष्ण

    काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
    महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥

    हिंदी अर्थरजोगुणसे उत्पन्न हुआ  यह काम ही क्रोध  है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī bhagavān uvācha
    kāma eṣha krodha eṣha rajo-guṇa-samudbhavaḥ
    mahāśhano mahā-pāpmā viddhyenam iha vairiṇam

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  2. आप आदत से बड़े हैं

    इंद्रियों से ऊपर मन है, मन से ऊपर बुद्धि, और बुद्धि से भी ऊपर आप (आत्मा) हैं। खुद को आदत का ग़ुलाम नहीं, उसका मालिक मानिए।

    गीता 3.42 से 3.43 श्रीकृष्ण

    इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

    इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः।
    मनसस्तु परा बुद्धिर्यो बुद्धेः परतस्तु सः ॥ 3.42 ॥
    एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना।
    जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम् ॥ 3.43 ॥

    हिंदी अर्थइन्द्रियोंको (स्थूलशरीरसे) पर (श्रेष्ठ, सबल, प्रकाशक, व्यापक तथा सूक्ष्म) कहते हैं। इन्द्रियोंसे पर मन है, मनसे भी पर बुद्धि है औऱ जो बुद्धिसे भी पर है, वह (काम) है। इस तरह बुद्धिसे पर - (काम-) को जानकर अपने द्वारा अपने-आपको वशमें करके हे महाबाहो ! तू इस कामरूप दुर्जय शत्रुको मार डाल।

    रोमन में पढ़ें

    indriyāṇi parāṇyāhur indriyebhyaḥ paraṁ manaḥ
    manasas tu parā buddhir yo buddheḥ paratas tu saḥ
    evaṁ buddheḥ paraṁ buddhvā sanstabhyātmānam ātmanā
    jahi śhatruṁ mahā-bāho kāma-rūpaṁ durāsadam

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  3. केवल रोकना काफ़ी नहीं

    विषय छोड़ देने पर भी उनका रस बचा रहता है — वह रस तभी जाता है जब कुछ ऊँचा अनुभव मिलता है। आदत की जगह कोई अच्छी चीज़ रखिए: टहलना, भजन, किसी से बात।

    गीता 2.59 श्रीकृष्ण

    विषया विनिवर्तन्ते निराहारस्य देहिनः।
    रसवर्जं रसोऽप्यस्य परं दृष्ट्वा निवर्तते ॥

    हिंदी अर्थनिराहारी (इन्द्रियोंको विषयोंसे हटानेवाले) मनुष्यके भी विषय तो निवृत्त हो जाते हैं, पर रस निवृत्त नहीं होता। परन्तु इस स्थितप्रज्ञ मनुष्यका तो रस भी परमात्मतत्त्वका अनुभव होनेसे निवृत्त हो जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    viṣhayā vinivartante nirāhārasya dehinaḥ
    rasa-varjaṁ raso ’pyasya paraṁ dṛiṣhṭvā nivartate

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  4. हारकर भी फिर शुरू करें

    मन चंचल है, पर अभ्यास और वैराग्य से वश में होता है। एक दिन फिसल गए तो पूरी यात्रा ख़त्म नहीं होती — अगले दिन फिर से।

    गीता 6.35 श्रीकृष्ण

    असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
    अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

    हिंदी अर्थहे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī bhagavān uvācha
    asanśhayaṁ mahā-bāho mano durnigrahaṁ chalam
    abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa cha gṛihyate

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि आप बुरे इंसान हैं। नशे की लत हो तो डॉक्टर या नशा-मुक्ति केंद्र की मदद लेना कमज़ोरी नहीं, समझदारी है।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।