“दिमाग़ में एक ही बात घूमती रहती है, सोचना बंद ही नहीं होता — क्या करूँ?”
गीता का छोटा जवाब
अर्जुन ने भी यही कहा था — “मन को रोकना हवा को रोकने जैसा कठिन है।” कृष्ण ने माना कि यह सच में कठिन है, और रास्ता दिया: अभ्यास और वैराग्य। मन जहाँ भी भागे, उसे प्यार से वापस लाते रहिए।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
आप अकेले नहीं हैं
अर्जुन ने कृष्ण से कहा — मन बड़ा चंचल, हठी और बलवान है; इसे वश में करना हवा को रोकने जैसा कठिन लगता है।
गीता 6.34अर्जुन
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥
हिंदी अर्थक्योंकि हे कृष्ण ! मन बड़ा ही चञ्चल, प्रमथनशील, दृढ़ (जिद्दी) और बलवान् है। उसका निग्रह करना मैं वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ।
हिंदी अर्थहे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
asanśhayaṁ mahā-bāho mano durnigrahaṁ chalam
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa cha gṛihyate
3
मन जहाँ भागे, वहाँ से लौटा लाइए
यह चंचल मन जिस-जिस कारण से भटके, वहाँ-वहाँ से हटाकर उसे बार-बार अपने लक्ष्य पर लगाइए — डाँटकर नहीं, धीरे से।
हिंदी अर्थधैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे।
रोमन में पढ़ें
śhanaiḥ śhanair uparamed buddhyā dhṛiti-gṛihītayā
ātma-sansthaṁ manaḥ kṛitvā na kiñchid api chintayet
5
मन दुश्मन भी है, दोस्त भी
जिसने मन को जीत लिया, उसका मन उसका सबसे अच्छा मित्र है; जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही शत्रु जैसा व्यवहार करता है।
हिंदी अर्थजिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है।
रोमन में पढ़ें
bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ
anātmanas tu śhatrutve vartetātmaiva śhatru-vat
✋ गीता यह नहीं कहती
गीता यह नहीं कहती कि सोचना बुरा है या मन को ज़बरदस्ती खाली करना है। बाहर से रोककर भीतर उसी में उलझे रहने को वह दिखावा कहती है (3.6)।