जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · मन और सोच

“दिमाग़ में एक ही बात घूमती रहती है, सोचना बंद ही नहीं होता — क्या करूँ?”

गीता का छोटा जवाब

अर्जुन ने भी यही कहा था — “मन को रोकना हवा को रोकने जैसा कठिन है।” कृष्ण ने माना कि यह सच में कठिन है, और रास्ता दिया: अभ्यास और वैराग्य। मन जहाँ भी भागे, उसे प्यार से वापस लाते रहिए।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. आप अकेले नहीं हैं

    अर्जुन ने कृष्ण से कहा — मन बड़ा चंचल, हठी और बलवान है; इसे वश में करना हवा को रोकने जैसा कठिन लगता है।

    गीता 6.34 अर्जुन

    चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
    तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥

    हिंदी अर्थक्योंकि हे कृष्ण ! मन बड़ा ही चञ्चल, प्रमथनशील, दृढ़ (जिद्दी) और बलवान् है। उसका निग्रह करना मैं वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ।

    रोमन में पढ़ें

    chañchalaṁ hi manaḥ kṛiṣhṇa pramāthi balavad dṛiḍham
    tasyāhaṁ nigrahaṁ manye vāyor iva su-duṣhkaram

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  2. रास्ता है: अभ्यास और वैराग्य

    कृष्ण ने अर्जुन की बात को झुठलाया नहीं — “निःसंदेह मन कठिनता से वश में होता है, पर अभ्यास और वैराग्य से यह वश में होता है।”

    गीता 6.35 श्रीकृष्ण

    असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
    अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

    हिंदी अर्थहे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī bhagavān uvācha
    asanśhayaṁ mahā-bāho mano durnigrahaṁ chalam
    abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa cha gṛihyate

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  3. मन जहाँ भागे, वहाँ से लौटा लाइए

    यह चंचल मन जिस-जिस कारण से भटके, वहाँ-वहाँ से हटाकर उसे बार-बार अपने लक्ष्य पर लगाइए — डाँटकर नहीं, धीरे से।

    गीता 6.26 श्रीकृष्ण

    यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
    ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

    हिंदी अर्थयह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही  लगाये।

    रोमन में पढ़ें

    yato yato niśhcharati manaśh chañchalam asthiram
    tatas tato niyamyaitad ātmanyeva vaśhaṁ nayet

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  4. धीरे-धीरे, जल्दबाज़ी नहीं

    धैर्य वाली बुद्धि से मन को धीरे-धीरे शांत करना है — एक दिन में नहीं।

    गीता 6.25 श्रीकृष्ण

    शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
    आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥

    हिंदी अर्थधैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे।

    रोमन में पढ़ें

    śhanaiḥ śhanair uparamed buddhyā dhṛiti-gṛihītayā
    ātma-sansthaṁ manaḥ kṛitvā na kiñchid api chintayet

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  5. मन दुश्मन भी है, दोस्त भी

    जिसने मन को जीत लिया, उसका मन उसका सबसे अच्छा मित्र है; जिसने नहीं जीता, उसके लिए वही शत्रु जैसा व्यवहार करता है।

    गीता 6.6 श्रीकृष्ण

    बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
    अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥

    हिंदी अर्थजिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है।

    रोमन में पढ़ें

    bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ
    anātmanas tu śhatrutve vartetātmaiva śhatru-vat

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि सोचना बुरा है या मन को ज़बरदस्ती खाली करना है। बाहर से रोककर भीतर उसी में उलझे रहने को वह दिखावा कहती है (3.6)।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।