जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · मन और सोच

“हर छोटी बात दिल पर क्यों लग जाती है?”

गीता का छोटा जवाब

गीता कहती है कि सुख-दुःख की ये चोटें आती-जाती हैं। स्थिर मन वह है जो दुख में टूटे नहीं और सुख में बहे नहीं — और यह गुण धीरे-धीरे सीखा जा सकता है।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. ये चोटें आती-जाती हैं

    इंद्रियों और विषयों का मिलना ही सर्दी-गर्मी, सुख-दुःख देता है। ये अनित्य हैं — इन्हें सहन करना सीखिए।

    गीता 2.14 श्रीकृष्ण

    मात्रास्पर्शास्तु कौन्तेय शीतोष्णसुखदुःखदाः।
    आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत ॥

    हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! इन्द्रियोंके जो विषय (जड पदार्थ) हैं, वो तो शीत (अनुकूलता) और उष्ण (प्रतिकूलता) - के द्वारा सुख और दुःख देनेवाले हैं तथा आने-जानेवाले और अनित्य हैं। हे भरतवंशोद्भव अर्जुन! उनको तुम सहन करो।

    रोमन में पढ़ें

    mātrā-sparśhās tu kaunteya śhītoṣhṇa-sukha-duḥkha-dāḥ
    āgamāpāyino ’nityās tans-titikṣhasva bhārata

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  2. स्थिर मन की पहचान

    जो दुख में उद्विग्न नहीं होता, सुख की लालसा नहीं रखता, और राग, भय, क्रोध से मुक्त है — उसे स्थिर बुद्धि वाला कहा गया है।

    गीता 2.56 श्रीकृष्ण

    दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः।
    वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥

    हिंदी अर्थदुःखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें उद्वेग नहीं होता और सुखोंकी प्राप्ति होनेपर जिसके मनमें स्पृहा नहीं होती तथा जो राग, भय और क्रोधसे सर्वथा रहित हो गया है, वह मननशील मनुष्य स्थिरबुद्धि कहा जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    duḥkheṣhv-anudvigna-manāḥ sukheṣhu vigata-spṛihaḥ
    vīta-rāga-bhaya-krodhaḥ sthita-dhīr munir uchyate

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  3. प्रिय-अप्रिय दोनों में सम

    प्रिय पाकर बहुत खुश न हो और अप्रिय पाकर बहुत दुखी न हो — ऐसा व्यक्ति भीतर से स्थिर रहता है।

    गीता 5.20 श्रीकृष्ण

    न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम्।
    स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविद्ब्रह्मणि स्थितः ॥

    हिंदी अर्थजो प्रियको प्राप्त होकर हर्षित न हो और अप्रियको प्राप्त होकर उद्विग्न न हो, वह स्थिर बुद्धिवाला, मूढ़तारहित तथा ब्रह्मको जाननेवाला मनुष्य ब्रह्ममें स्थित है।

    रोमन में पढ़ें

    na prahṛiṣhyet priyaṁ prāpya nodvijet prāpya chāpriyam
    sthira-buddhir asammūḍho brahma-vid brahmaṇi sthitaḥ

    अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
  4. भगवान का प्रिय कौन

    जो शत्रु-मित्र, मान-अपमान, निंदा-स्तुति में सम रहता है, मौन और संतुष्ट रहता है — वह भगवान को प्रिय है।

    गीता 12.18 से 12.19 श्रीकृष्ण

    इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

    समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
    शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 12.18 ॥
    तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
    अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ 12.19 ॥

    हिंदी अर्थजो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

    रोमन में पढ़ें

    samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ
    śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
    tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit
    aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ

    अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि भावनाएँ मार दो या पत्थर बन जाओ। समता का अर्थ संवेदनहीनता नहीं, भीतर की स्थिरता है।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।