गीता क्रोध को नरक के तीन द्वारों में गिनती है, क्योंकि वह बुद्धि का नाश करता है। पर वह अन्याय के सामने चुप रहना भी नहीं सिखाती — अर्जुन को धर्म के लिए खड़ा होने को कहा, पर क्रोध से नहीं, समता से।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
क्रोध की पूरी श्रृंखला
विषयों के चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मोह, और अंत में बुद्धि का नाश।
हिंदी अर्थविषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।