जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · मन और सोच

“क्या गुस्सा करना हमेशा गलत है?”

गीता का छोटा जवाब

गीता क्रोध को नरक के तीन द्वारों में गिनती है, क्योंकि वह बुद्धि का नाश करता है। पर वह अन्याय के सामने चुप रहना भी नहीं सिखाती — अर्जुन को धर्म के लिए खड़ा होने को कहा, पर क्रोध से नहीं, समता से।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. क्रोध की पूरी श्रृंखला

    विषयों के चिंतन से आसक्ति, आसक्ति से कामना, कामना से क्रोध, क्रोध से मोह, और अंत में बुद्धि का नाश।

    गीता 2.62 से 2.63 श्रीकृष्ण

    इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

    ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
    सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ 2.62 ॥
    क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
    स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ 2.63 ॥

    हिंदी अर्थविषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate
    saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho ’bhijāyate
    krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ
    smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  2. कामना ही क्रोध बनती है

    जब कामना पूरी नहीं होती, तो वही क्रोध का रूप ले लेती है — इसे गीता मनुष्य का बड़ा शत्रु कहती है।

    गीता 3.37 श्रीकृष्ण

    काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
    महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥

    हिंदी अर्थरजोगुणसे उत्पन्न हुआ  यह काम ही क्रोध  है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī bhagavān uvācha
    kāma eṣha krodha eṣha rajo-guṇa-samudbhavaḥ
    mahāśhano mahā-pāpmā viddhyenam iha vairiṇam

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  3. नरक के तीन द्वार

    काम, क्रोध और लोभ — ये तीनों आत्मा का पतन करने वाले द्वार हैं।

    गीता 16.21 श्रीकृष्ण

    त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
    कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

    हिंदी अर्थकाम, क्रोध और लोभ -- ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये।

    रोमन में पढ़ें

    tri-vidhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśhanam ātmanaḥ
    kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṁ tyajet

    अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
  4. अन्याय के सामने — पर समता से

    सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीत-हार को समान मानकर कर्तव्य करो। खड़े होना है, पर द्वेष से नहीं।

    गीता 2.38 श्रीकृष्ण

    सुखदुःखे समे कृत्वा लाभालाभौ जयाजयौ।
    ततो युद्धाय युज्यस्व नैवं पापमवाप्स्यसि ॥

    हिंदी अर्थजय-पराजय, लाभ-हानि और सुख-दुःखको समान करके फिर युद्धमें लग जा। इस प्रकार युद्ध करनेसे तू पापको प्राप्त नहीं होगा।

    रोमन में पढ़ें

    sukha-duḥkhe same kṛitvā lābhālābhau jayājayau
    tato yuddhāya yujyasva naivaṁ pāpam avāpsyasi

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि गलत को चुपचाप सहो। वह कहती है — कर्तव्य हो, पर क्रोध के बहाव में नहीं।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।