दुविधा #03 · मन और आदतेंज़िम्मेदारी बनाम सब छोड़ देना
भागदौड़ से थक गए हैं। मन करता है सब छोड़कर कहीं दूर चले जाएँ। आप क्या करेंगे?
अर्जुन भी धनुष-बाण छोड़कर रथ के पीछे बैठ गए थे (1.47)।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता का संन्यास घर-परिवार छोड़ना नहीं, कामना और आसक्ति छोड़ना है। कर्म चलते रहें, पर उनका बोझ मन से उतर जाए।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. सब छोड़ दूँगा — गीता कहती है कि केवल कर्म छोड़ देने से सिद्धि नहीं मिलती (3.4), और शरीर का निर्वाह भी कर्म से ही होता है (3.8)। बाहर से छोड़ना और मन से छूटना अलग बातें हैं (3.6)।
B. ज़बरदस्ती चलता रहूँगा — कर्म न छोड़ना गीता के अनुरूप है, पर 6.16–17 संतुलन की बात करते हैं — काम, नींद और विश्राम, सब “यथायोग्य”।
C. काम करते हुए भीतर से हल्का होऊँगा — यही गीता का संन्यास है — कर्मफल का आश्रय न लेकर कर्तव्य करने वाला ही संन्यासी और योगी है (6.1), और द्वन्द्वों से रहित मनुष्य सुख से बंधन से छूटता है (5.3)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
इन श्लोकों में देखें
इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक
गीता 3.4श्रीकृष्ण
न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
न च संन्यसनादेव सिद्धिं समधिगच्छति ॥
हिंदी अर्थमनुष्य न तो कर्मोंका आरम्भ किये बिना निष्कर्मताको प्राप्त होता है और न कर्मोंके त्यागमात्रसे सिद्धिको ही प्राप्त होता है।
रोमन में पढ़ें
na karmaṇām anārambhān naiṣhkarmyaṁ puruṣho ’śhnute
na cha sannyasanād eva siddhiṁ samadhigachchhati
हिंदी अर्थजो कर्मेन्द्रियों- (सम्पूर्ण इन्द्रियों-) को हठपूर्वक रोककर मनसे इन्द्रियोंके विषयोंका चिन्तन करता रहता है, वह मूढ़ बुद्धिवाला मनुष्य मिथ्याचारी (मिथ्या आचरण करनेवाला) कहा जाता है।
रोमन में पढ़ें
karmendriyāṇi sanyamya ya āste manasā smaran
indriyārthān vimūḍhātmā mithyāchāraḥ sa uchyate
गीता 3.8श्रीकृष्ण
नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः।
शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः ॥
हिंदी अर्थतू शास्त्रविधिसे नियत किये हुए कर्तव्य-कर्म कर; क्योंकि कर्म न करनेकी अपेक्षा कर्म करना श्रेष्ठ है तथा कर्म न करनेसे तेरा शरीर-निर्वाह भी सिद्ध नहीं होगा।
रोमन में पढ़ें
niyataṁ kuru karma tvaṁ karma jyāyo hyakarmaṇaḥ
śharīra-yātrāpi cha te na prasiddhyed akarmaṇaḥ
हिंदी अर्थसंन्यास (सांख्ययोग) और कर्मयोग दोनों ही कल्याण करनेवाले हैं। परन्तु उन दोनोंमें भी कर्मसंन्यास- (सांख्ययोग-) से कर्मयोग श्रेष्ठ है।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
sannyāsaḥ karma-yogaśh cha niḥśhreyasa-karāvubhau
tayos tu karma-sannyāsāt karma-yogo viśhiṣhyate
गीता 5.3श्रीकृष्ण
ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥
हिंदी अर्थहे महाबाहो ! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।
रोमन में पढ़ें
jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣhṭi na kāṅkṣhati
nirdvandvo hi mahā-bāho sukhaṁ bandhāt pramuchyate
गीता 6.1श्रीकृष्ण
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
हिंदी अर्थकर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ
sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ
गीता 18.11श्रीकृष्ण
न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः।
यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥
हिंदी अर्थकारण कि देहधारी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करना सम्भव नहीं है। इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है -- ऐसा कहा जाता है।
रोमन में पढ़ें
na hi deha-bhṛitā śhakyaṁ tyaktuṁ karmāṇy aśheṣhataḥ
yas tu karma-phala-tyāgī sa tyāgīty abhidhīyate
गीता 6.16श्रीकृष्ण
नात्यश्नतस्तु योगोऽस्ति न चैकान्तमनश्नतः।
न चातिस्वप्नशीलस्य जाग्रतो नैव चार्जुन ॥
हिंदी अर्थहे अर्जुन ! यह योग न तो अधिक खानेवालेका और न बिलकुल न खानेवालेका तथा न अधिक सोनेवालेका और न बिलकुल न सोनेवालेका ही सिद्ध होता है।
रोमन में पढ़ें
nātyaśhnatastu yogo ’sti na chaikāntam anaśhnataḥ
na chāti-svapna-śhīlasya jāgrato naiva chārjuna
हिंदी अर्थदुःखोंका नाश करनेवाला योग तो यथायोग्य आहार और विहार करनेवालेका, कर्मोंमें यथायोग्य चेष्टा करनेवालेका तथा यथायोग्य सोने और जागनेवालेका ही सिद्ध होता है।