किसी ने सबके सामने आपका अपमान किया। आप क्या करेंगे?
ऐसे पल में सबसे पहले गुस्सा आता है — और गुस्से में लिया फ़ैसला अक्सर बाद में चुभता है।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता अपमान पर चुप्पी या जवाब की कोई सूची नहीं देती — वह पहले क्रोध के वेग से ऊपर उठने को कहती है। शांत मन से लिया गया निर्णय ही विवेकपूर्ण होता है।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. उसी वक़्त जवाब दूँगा — गीता क्रोध की पूरी श्रृंखला बताती है — क्रोध से मोह, मोह से स्मृति-भ्रम और फिर बुद्धि का नाश (2.63)। तुरंत दिया जवाब अक्सर इसी श्रृंखला से निकलता है।
B. चुप रहूँगा, पर मन में रखूँगा — बाहर से शांत, भीतर से जलता मन — 3.6 ऐसी स्थिति की बात करता है जहाँ बाहर रोक है पर मन में चिंतन चलता रहता है। राग-द्वेष को गीता मनुष्य का शत्रु कहती है (3.34)।
C. शांत होकर देखूँगा, फिर तय करूँगा — 5.23 कहता है — जो काम-क्रोध के वेग को सह लेता है, वही योगी है और वही सुखी है। 12.18–19 में स्थिर व्यक्ति मान-अपमान में सम रहता है।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
हिंदी अर्थविषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।
शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥
हिंदी अर्थइस मनुष्य-शरीरमें जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटनेसे पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है।
रोमन में पढ़ें
śhaknotīhaiva yaḥ soḍhuṁ prāk śharīra-vimokṣhaṇāt
kāma-krodhodbhavaṁ vegaṁ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ
हिंदी अर्थइन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।
रोमन में पढ़ें
indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣhau vyavasthitau
tayor na vaśham āgachchhet tau hyasya paripanthinau
गीता 12.18 से 12.19श्रीकृष्ण
इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 12.18 ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ 12.19 ॥
हिंदी अर्थजो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।
रोमन में पढ़ें
samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ
śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit
aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ
गीता 16.3श्रीकृष्ण
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।