अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #24 · रिश्ते और दोस्ती दोस्ती बनाम गलत आदतें

दोस्तों का ग्रुप नशे और गलत आदतों की ओर खींच रहा है, मना करो तो मज़ाक उड़ता है। आप क्या करेंगे?

संगत बदलना आसान नहीं, और साथ रहना भी।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता संग के असर को गंभीरता से लेती है — संग से ही आसक्ति और कामना जन्म लेती है (2.62)। अपने मन का उद्धार अपने ही हाथ में है (6.5)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. साथ दे दूँगा — गीता कहती है विषयों का बार-बार चिंतन और संग ही आसक्ति पैदा करता है (2.62)। “थोड़ा-बहुत” अक्सर यहीं से शुरू होता है।

B. ग्रुप ही छोड़ दूँगा — अपने को बचाना गीता के “अपना उद्धार स्वयं करो” के अनुरूप है (6.5)।

C. दोस्ती रखूँगा, पर आदतों को साफ़ मना करूँगा — यह साहस और विवेक, दोनों है — अपने मन पर टिकना (6.5), और उदाहरण बनना: श्रेष्ठ जो करता है, दूसरे वही सीखते हैं (3.21)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 2.62 से 2.63 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ 2.62 ॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ 2.63 ॥

हिंदी अर्थविषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate
saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho ’bhijāyate
krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ
smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 6.5 श्रीकृष्ण

उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

हिंदी अर्थअपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।

रोमन में पढ़ें

uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet
ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.6 श्रीकृष्ण

बन्धुरात्माऽऽत्मनस्तस्य येनात्मैवात्मना जितः।
अनात्मनस्तु शत्रुत्वे वर्तेतात्मैव शत्रुवत् ॥

हिंदी अर्थजिसने अपने-आपसे अपने-आपको जीत लिया है, उसके लिये आप ही अपना बन्धु है और जिसने अपने-आपको नहीं जीता है, ऐसे अनात्माका आत्मा ही शत्रुतामें शत्रुकी तरह बर्ताव करता है।

रोमन में पढ़ें

bandhur ātmātmanas tasya yenātmaivātmanā jitaḥ
anātmanas tu śhatrutve vartetātmaiva śhatru-vat

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 3.21 श्रीकृष्ण

यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥

हिंदी अर्थश्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण  देता है,  दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।

रोमन में पढ़ें

yad yad ācharati śhreṣhṭhas tat tad evetaro janaḥ
sa yat pramāṇaṁ kurute lokas tad anuvartate

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 18.38 श्रीकृष्ण

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेऽमृतोपमम्।
परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम् ॥

हिंदी अर्थजो सुख इन्द्रियों और विषयोंके संयोगसे आरम्भमें अमृतकी तरह और परिणाममें विषकी तरह होता है, वह सुख राजस कहा गया है।

रोमन में पढ़ें

viṣhayendriya-sanyogād yat tad agre ’mṛitopamam
pariṇāme viṣham iva tat sukhaṁ rājasaṁ smṛitam

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग

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