जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · लोग और रिश्ते

““लोग क्या कहेंगे” — यह डर मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ता?”

गीता का छोटा जवाब

गीता मान-अपमान और निंदा-स्तुति में एक जैसा रहने वाले को भगवान का प्रिय कहती है। लोगों की राय बदलती रहती है; आपका धर्म नहीं — फ़ैसले का आधार धर्म हो, भीड़ नहीं।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. निंदा-स्तुति में सम

    जो मान-अपमान, निंदा-स्तुति में एक जैसा रहता है, कम बोलता है और जो मिले उसमें संतुष्ट रहता है — वह भगवान को प्रिय है।

    गीता 12.18 से 12.19 श्रीकृष्ण

    इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

    समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
    शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 12.18 ॥
    तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
    अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ 12.19 ॥

    हिंदी अर्थजो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।

    रोमन में पढ़ें

    samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ
    śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
    tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit
    aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ

    अध्याय 12 · भक्तियोग
  2. गुणों से ऊपर उठे व्यक्ति की पहचान

    जो मान-अपमान को, मित्र-शत्रु को एक समान देखता है — गीता उसे गुणों से पार हुआ कहती है।

    गीता 14.24 से 14.25 श्रीकृष्ण

    इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

    समदुःखसुखः स्वस्थः समलोष्टाश्मकाञ्चनः।
    तुल्यप्रियाप्रियो धीरस्तुल्यनिन्दात्मसंस्तुतिः ॥ 14.24 ॥
    मानापमानयोस्तुल्यस्तुल्यो मित्रारिपक्षयोः।
    सर्वारम्भपरित्यागी गुणातीतः स उच्यते ॥ 14.25 ॥

    हिंदी अर्थजो धीर मनुष्य सुख-दुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है; जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रिय-अप्रियमें तथा अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है; जो मान-अपमानमें तथा मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    sama-duḥkha-sukhaḥ sva-sthaḥ sama-loṣhṭāśhma-kāñchanaḥ
    tulya-priyāpriyo dhīras tulya-nindātma-sanstutiḥ
    mānāpamānayos tulyas tulyo mitrāri-pakṣhayoḥ
    sarvārambha-parityāgī guṇātītaḥ sa uchyate

    अध्याय 14 · गुणत्रयविभागयोग
  3. अपनी राह पर चलिए

    दूसरे के धर्म से अपना धर्म श्रेष्ठ है। लोगों को खुश करने के लिए अपनी राह छोड़ना भय वाला है।

    गीता 3.35 श्रीकृष्ण

    श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
    स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः ॥

    हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।

    रोमन में पढ़ें

    śhreyān swa-dharmo viguṇaḥ para-dharmāt sv-anuṣhṭhitāt
    swa-dharme nidhanaṁ śhreyaḥ para-dharmo bhayāvahaḥ

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  4. आप खुद अपने मित्र बनिए

    मनुष्य खुद ही अपना मित्र है और खुद ही शत्रु — दूसरों की राय से ज़्यादा मायने इसी का है।

    गीता 6.5 श्रीकृष्ण

    उद्धरेदात्मनाऽऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्।
    आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥

    हिंदी अर्थअपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न करे; क्योंकि आप ही अपना मित्र है और आप ही अपना शत्रु है।

    रोमन में पढ़ें

    uddhared ātmanātmānaṁ nātmānam avasādayet
    ātmaiva hyātmano bandhur ātmaiva ripur ātmanaḥ

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि किसी की परवाह मत करो या मनमानी करो। वह कहती है कि फ़ैसले की कसौटी धर्म हो, लोगों की ताली या ताने नहीं।

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सभी जीवन के सवाल कर्म, मन, दुख, रिश्ते, भगवान — गीता के जवाब

जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।