““लोग क्या कहेंगे” — यह डर मेरा पीछा क्यों नहीं छोड़ता?”
गीता का छोटा जवाब
गीता मान-अपमान और निंदा-स्तुति में एक जैसा रहने वाले को भगवान का प्रिय कहती है। लोगों की राय बदलती रहती है; आपका धर्म नहीं — फ़ैसले का आधार धर्म हो, भीड़ नहीं।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
निंदा-स्तुति में सम
जो मान-अपमान, निंदा-स्तुति में एक जैसा रहता है, कम बोलता है और जो मिले उसमें संतुष्ट रहता है — वह भगवान को प्रिय है।
गीता 12.18 से 12.19श्रीकृष्ण
इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है
समः शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयोः।
शीतोष्णसुखदुःखेषु समः सङ्गविवर्जितः ॥ 12.18 ॥ तुल्यनिन्दास्तुतिर्मौनी सन्तुष्टो येनकेनचित्।
अनिकेतः स्थिरमतिर्भक्तिमान्मे प्रियो नरः ॥ 12.19 ॥
हिंदी अर्थजो शत्रु और मित्रमें तथा मान-अपमानमें सम है और शीत-उष्ण (अनुकूलता-प्रतिकूलता) तथा सुख-दुःखमें सम है एवं आसक्तिसे रहित है, और जो निन्दास्तुतिको समान समझनेवाला, मननशील, जिस-किसी प्रकारसे भी (शरीरका निर्वाह होनेमें) संतुष्ट, रहनेके स्थान तथा शरीरमें ममता-आसक्तिसे रहित और स्थिर बुद्धिवाला है, वह भक्तिमान् मनुष्य मुझे प्रिय है।
रोमन में पढ़ें
samaḥ śhatrau cha mitre cha tathā mānāpamānayoḥ
śhītoṣhṇa-sukha-duḥkheṣhu samaḥ saṅga-vivarjitaḥ
tulya-nindā-stutir maunī santuṣhṭo yena kenachit
aniketaḥ sthira-matir bhaktimān me priyo naraḥ
2
गुणों से ऊपर उठे व्यक्ति की पहचान
जो मान-अपमान को, मित्र-शत्रु को एक समान देखता है — गीता उसे गुणों से पार हुआ कहती है।
हिंदी अर्थजो धीर मनुष्य सुख-दुःखमें सम तथा अपने स्वरूपमें स्थित रहता है; जो मिट्टीके ढेले, पत्थर और सोनेमें सम रहता है जो प्रिय-अप्रियमें तथा अपनी निन्दा-स्तुतिमें सम रहता है; जो मान-अपमानमें तथा मित्र-शत्रुके पक्षमें सम रहता है जो सम्पूर्ण कर्मोंके आरम्भका त्यागी है, वह मनुष्य गुणातीत कहा जाता है।
हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।