जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · लोग और रिश्ते

“सबके बीच रहकर भी अकेला क्यों महसूस होता है?”

गीता का छोटा जवाब

गीता कहती है कि भगवान हर प्राणी के हृदय में रहते हैं — आप भीतर से कभी अकेले नहीं। आप उसी के सनातन अंश हैं; जो भीतर इस रिश्ते को पहचान लेता है, उसका अकेलापन साथ में बदल जाता है।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. वे आपके भीतर हैं

    ईश्वर सब प्राणियों के हृदय में रहते हैं।

    गीता 18.61 श्रीकृष्ण

    ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
    भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥

    हिंदी अर्थहे अर्जुन ! ईश्वर सम्पूर्ण प्राणियोंके हृदयमें रहता है और अपनी मायासे शरीररूपी यन्त्रपर आरूढ़ हुए सम्पूर्ण प्राणियोंको (उनके स्वभावके अनुसार) भ्रमण कराता रहता है।

    रोमन में पढ़ें

    īśhvaraḥ sarva-bhūtānāṁ hṛid-deśhe ‘rjuna tiṣhṭhati
    bhrāmayan sarva-bhūtāni yantrārūḍhāni māyayā

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
  2. आप उसी के अंश हैं

    इस संसार में जीव भगवान का ही सनातन अंश है।

    गीता 15.7 श्रीकृष्ण

    ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
    मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥

    हिंदी अर्थइस संसारमें जीव बना हुआ आत्मा मेरा ही सनातन अंश है; परन्तु वह प्रकृतिमें स्थित मन और पाँचों इन्द्रियोंको आकर्षित करता है (अपना मान लेता है)।

    रोमन में पढ़ें

    mamaivānśho jīva-loke jīva-bhūtaḥ sanātanaḥ
    manaḥ-ṣhaṣhṭhānīndriyāṇi prakṛiti-sthāni karṣhati

    अध्याय 15 · पुरुषोत्तमयोग
  3. जो भजता है, वह उनमें

    भगवान सबके प्रति सम हैं, पर जो प्रेम से उन्हें भजते हैं, वे उनमें हैं और वे उनमें।

    गीता 9.29 श्रीकृष्ण

    समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
    ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥

    हिंदी अर्थमैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं  उनमें हूँ।

    रोमन में पढ़ें

    samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ
    ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
  4. भीतर का सुख

    जिसका सुख भीतर है, जो भीतर ही रमता है और भीतर ही प्रकाश पाता है — वह शांति पाता है।

    गीता 5.24 श्रीकृष्ण

    योऽन्तःसुखोऽन्तरारामस्तथान्तर्ज्योतिरेव यः।
    स योगी ब्रह्मनिर्वाणं ब्रह्मभूतोऽधिगच्छति ॥

    हिंदी अर्थजो मनुष्य केवल परमात्मामें सुखवाला है और केवल परमात्मामें रमण करनेवाला है तथा जो केवल परमात्मामें ज्ञानवाला है, वह ब्रह्ममें अपनी स्थितिका अनुभव करनेवाला सांख्ययोगी निर्वाण ब्रह्मको प्राप्त होता है।

    रोमन में पढ़ें

    yo 'ntaḥ-sukho 'ntar-ārāmas tathāntar-jyotir eva yaḥ
    sa yogī brahma-nirvāṇaṁ brahma-bhūto 'dhigachchhati

    अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि लोगों से दूर हो जाइए या अकेलेपन को चुपचाप सहते रहिए। अपनों से बात करना और मदद लेना भी ज़रूरी है।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।