जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · लोग और रिश्ते

“जिसने बहुत दुख दिया, क्या उसे माफ़ करना ज़रूरी है?”

गीता का छोटा जवाब

गीता माफ़ी को कमज़ोरी नहीं, दैवी गुण मानती है। माफ़ करने का मतलब यह नहीं कि जो हुआ वह सही था — इसका मतलब है कि अब उसकी आग आपके मन को नहीं जलाएगी।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. नफ़रत सबसे ज़्यादा आपको जलाती है

    क्रोध को गीता मनुष्य का वैरी कहती है — जो बहुत खाता है और कभी तृप्त नहीं होता। मन में रखा बदला सामने वाले से ज़्यादा आपको खाता है।

    गीता 3.37 श्रीकृष्ण

    काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
    महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥

    हिंदी अर्थरजोगुणसे उत्पन्न हुआ  यह काम ही क्रोध  है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।

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    śhrī bhagavān uvācha
    kāma eṣha krodha eṣha rajo-guṇa-samudbhavaḥ
    mahāśhano mahā-pāpmā viddhyenam iha vairiṇam

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  2. माफ़ी = भीतर से छूट जाना

    जो न किसी से द्वेष करता है, न किसी की कामना — वह द्वन्द्वों से मुक्त होकर सुख से बंधन से छूट जाता है। माफ़ी सबसे पहले अपने लिए है।

    गीता 5.3 श्रीकृष्ण

    ज्ञेयः स नित्यसंन्यासी यो न द्वेष्टि न काङ्क्षति।
    निर्द्वन्द्वो हि महाबाहो सुखं बन्धात्प्रमुच्यते ॥

    हिंदी अर्थहे महाबाहो ! जो मनुष्य न किसीसे द्वेष करता है और न किसीकी आकाङ्क्षा करता है; वह (कर्मयोगी) सदा संन्यासी समझनेयोग्य है; क्योंकि द्वन्द्वोंसे रहित मनुष्य सुखपूर्वक संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    jñeyaḥ sa nitya-sannyāsī yo na dveṣhṭi na kāṅkṣhati
    nirdvandvo hi mahā-bāho sukhaṁ bandhāt pramuchyate

    अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
  3. क्षमा दैवी गुण है

    सबके प्रति द्वेष-रहित, मित्र-भाव और दया रखने वाला, क्षमाशील — ऐसा भक्त भगवान को प्रिय है।

    गीता 12.13 श्रीकृष्ण

    अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
    निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

    हिंदी अर्थसब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला? मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।

    रोमन में पढ़ें

    adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha
    nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī

    अध्याय 12 · भक्तियोग
    गीता 16.3 श्रीकृष्ण

    तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
    भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥

    हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

    रोमन में पढ़ें

    tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā
    bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata

    अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
  4. सम रहना, अंधा होना नहीं

    श्रेष्ठ वह है जो मित्र, वैरी और बुरा करने वालों के प्रति भी समबुद्धि रखता है। समता का अर्थ सबको बराबर सम्मान देना है — हर किसी पर आँख बंद करके फिर से भरोसा करना नहीं।

    गीता 6.9 श्रीकृष्ण

    सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
    साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥

    हिंदी अर्थसुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियोंमें तथा साधु-आचरण करनेवालोंमें और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है।

    रोमन में पढ़ें

    suhṛin-mitrāryudāsīna-madhyastha-dveṣhya-bandhuṣhu
    sādhuṣhvapi cha pāpeṣhu sama-buddhir viśhiṣhyate

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि माफ़ करके आप उसी व्यक्ति के साथ रहें जो बार-बार नुकसान पहुँचा रहा है। माफ़ी और दूरी, दोनों साथ हो सकते हैं।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।