“बच्चे बात नहीं मानते, उनकी चिंता लगी रहती है — मैं क्या करूँ?”
गीता का छोटा जवाब
गीता कहती है कि लोग वही करते हैं जो बड़े करते हैं — बच्चे सुनने से ज़्यादा देखकर सीखते हैं। कृष्ण ने भी अर्जुन को पूरा समझाया, फिर फ़ैसला उसी पर छोड़ा। प्रेम से समझाइए, खुद उदाहरण बनिए, और चिंता भगवान को सौंपिए।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
बच्चे देखकर सीखते हैं
श्रेष्ठ मनुष्य जैसा आचरण करता है, दूसरे वैसा ही करते हैं। अगर हम फ़ोन छोड़ नहीं पाते, गुस्सा करते हैं — तो बच्चों को इसके उलट कहना असर नहीं करता।
गीता 3.21श्रीकृष्ण
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते ॥
हिंदी अर्थश्रेष्ठ मनुष्य जो-जो आचरण करता है, दूसरे मनुष्य वैसा-वैसा ही आचरण करते हैं। वह जो कुछ प्रमाण देता है, दूसरे मनुष्य उसीके अनुसार आचरण करते हैं।
रोमन में पढ़ें
yad yad ācharati śhreṣhṭhas tat tad evetaro janaḥ
sa yat pramāṇaṁ kurute lokas tad anuvartate
2
समझाइए, फिर सोचने दीजिए
पूरी गीता कहने के बाद कृष्ण ने अर्जुन से कहा — “इस पर अच्छी तरह विचार करो, फिर जैसा चाहो वैसा करो।” डाँट से बात मनवाई जा सकती है, समझ नहीं।
गीता 18.63श्रीकृष्ण
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
हिंदी अर्थयह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।
रोमन में पढ़ें
iti te jñānam ākhyātaṁ guhyād guhyataraṁ mayā
vimṛiśhyaitad aśheṣheṇa yathechchhasi tathā kuru
3
वाणी में प्रेम रहे
ऐसी बात जो सच हो, प्रिय हो और हित करे, उद्वेग न करे — यही वाणी का तप है। बच्चों से बात करते समय यही कसौटी रखें।
हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
रोमन में पढ़ें
anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate
4
चिंता का बोझ उतारिए
कृष्ण कहते हैं — अपने कर्म मुझे अर्पण करके ममता और संताप छोड़कर अपना कर्तव्य करो। अपना कर्तव्य पूरे मन से कीजिए; बच्चों का हर परिणाम आपके हाथ में नहीं।