“पति-पत्नी में रोज़ झगड़ा होता है — रिश्ता कैसे बचाऊँ?”
गीता का छोटा जवाब
गीता कहती है कि झगड़े की जड़ अक्सर सामने वाला नहीं, हमारे भीतर का काम-क्रोध होता है। वाणी पर संयम, दूसरे के दुख को अपना समझना और क्षमा — यही रिश्ते को बचाते हैं।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
झगड़े की असली जड़
कृष्ण कहते हैं कि इच्छा पूरी न हो तो वही काम क्रोध बन जाता है — और यही मनुष्य का असली वैरी है। अक्सर लड़ाई “तुमने ऐसा क्यों किया” की नहीं, “मेरी उम्मीद टूटी” की होती है।
गीता 3.37श्रीकृष्ण
काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥
हिंदी अर्थरजोगुणसे उत्पन्न हुआ यह काम ही क्रोध है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।
हिंदी अर्थविषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।
हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।
रोमन में पढ़ें
anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate
4
उसकी जगह खड़े होकर देखें
सबसे ऊँचा योगी वह है जो दूसरे के सुख-दुख को अपने शरीर की तरह महसूस करता है। एक बार सामने वाले की थकान और डर को उसकी नज़र से देखिए।
गीता 6.32श्रीकृष्ण
आत्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जुन।
सुखं वा यदि वा दुःखं सः योगी परमो मतः ॥
हिंदी अर्थहे अर्जुन ! जो (ध्यानयुक्त ज्ञानी महापुरुष) अपने शरीरकी उपमासे सब जगह अपनेको समान देखता है और सुख अथवा दुःखको भी समान देखता है, वह परम योगी माना गया है।
रोमन में पढ़ें
ātmaupamyena sarvatra samaṁ paśhyati yo ’rjuna
sukhaṁ vā yadi vā duḥkhaṁ sa yogī paramo mataḥ
5
क्षमा रिश्ते की ताक़त है
तेज, क्षमा, धैर्य और वैर का न होना — गीता इन्हें दैवी गुण कहती है। रोज़ के छोटे झगड़ों में क्षमा हार नहीं, रिश्ते की जीत है।
गीता 16.3श्रीकृष्ण
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।
गीता यह नहीं कहती कि मारपीट, गाली या अपमान चुपचाप सहते रहो। अगर रिश्ते में हिंसा है, तो अपनी सुरक्षा पहले है — अपनों या मदद करने वाली संस्थाओं से तुरंत बात करें।