सही काम पता है, लेकिन उससे अपने ही लोग नाराज़ होंगे। आप क्या करेंगे?
अर्जुन के सामने ठीक यही स्थिति थी — एक तरफ़ कर्तव्य, दूसरी तरफ़ गुरु, भाई और परिवार।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
अर्जुन की दुविधा में अपनों का मोह, कर्तव्य और परिणाम का डर आपस में उलझे थे। गीता का ज़ोर इस पर है कि अपना कर्तव्य पहचानकर उसे बिना आसक्ति के किया जाए — सुख-दुःख और जीत-हार को समान मानकर (2.38)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. रिश्ता बचाने के लिए पीछे हट जाऊँगा — अर्जुन ने भी पहले यही चुना था — “मैं युद्ध नहीं करूँगा” (2.9)। गीता इस भावना को ठुकराती नहीं, पर 2.7 में अर्जुन खुद मानते हैं कि मोह ने उनकी समझ को ढक दिया था।
B. जो सही है, वही करूँगा — यह गीता के स्वधर्म वाले विचार के करीब है (3.35, 18.47)। साथ में गीता यह भी कहती है कि कर्म आसक्ति और अहंकार के बिना हो — नाराज़गी के जवाब में कठोरता न आए।
C. पहले ठहरकर किसी समझदार से पूछूँगा — अर्जुन ने आख़िर में यही किया — “मैं आपका शिष्य हूँ, मुझे बताइए” (2.7)। 4.34 भी जानकार से विनम्रता से पूछने की बात कहता है; बस सलाह के बाद निर्णय खुद लेना होता है (18.63)।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
हिंदी अर्थकायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि।
धर्म्याद्धि युद्धाछ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥
हिंदी अर्थअपने स्वधर्म (क्षात्रधर्म) को देखकर भी तुम्हें विकम्पित अर्थात् कर्तव्य-कर्मसे विचलित नहीं होना चाहिये; क्योंकि धर्ममय युद्धसे बढ़कर क्षत्रियके लिये दूसरा कोई कल्याणकारक कर्म नहीं है।
रोमन में पढ़ें
swa-dharmam api chāvekṣhya na vikampitum arhasi
dharmyāddhi yuddhāch chhreyo ’nyat kṣhatriyasya na vidyate
हिंदी अर्थअच्छी तरह आचरणमें लाये हुए दूसरेके धर्मसे गुणोंकी कमीवाला अपना धर्म श्रेष्ठ है। अपने धर्ममें तो मरना भी कल्याणकारक है और दूसरेका धर्म भयको देनेवाला है।
हिंदी अर्थअच्छी तरहसे अनुष्ठान किये हुए परधर्मसे गुणरहित अपना धर्म श्रेष्ठ है। कारण कि स्वभावसे नियत किये हुए स्वधर्मरूप कर्मको करता हुआ मनुष्य पापको प्राप्त नहीं होता।
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
हिंदी अर्थउस- (तत्त्वज्ञान-) को (तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुषोंके पास जाकर) समझ। उनको साष्टाङ्ग दण्डवत् प्रणाम करनेसे, उनकी सेवा करनेसे और सरलतापूर्वक प्रश्न करनेसे वे तत्त्वदर्शी ज्ञानी महापुरुष तुझे उस तत्त्वज्ञानका उपदेश देंगे।
रोमन में पढ़ें
tad viddhi praṇipātena paripraśhnena sevayā
upadekṣhyanti te jñānaṁ jñāninas tattva-darśhinaḥ
गीता 18.63श्रीकृष्ण
इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया।
विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥
हिंदी अर्थयह गुह्यसे भी गुह्यतर (शरणागतिरूप) ज्ञान मैंने तुझे कह दिया। अब तू इसपर अच्छी तरहसे विचार करके जैसा चाहता है, वैसा कर।
रोमन में पढ़ें
iti te jñānam ākhyātaṁ guhyād guhyataraṁ mayā
vimṛiśhyaitad aśheṣheṇa yathechchhasi tathā kuru