जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · लोग और रिश्ते

“जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा किया, उसी ने धोखा दिया — अब क्या करूँ?”

गीता का छोटा जवाब

धोखे का दर्द सच्चा है। गीता राग-द्वेष को मन के शत्रु कहती है — बदले की आग सबसे पहले आपको ही जलाती है। उसका रास्ता है: द्वेष के बिना, पर विवेक के साथ आगे बढ़ना।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. द्वेष आपका ही शत्रु है

    हर इंद्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे रहते हैं — इनके वश में मत होइए, ये कल्याण के मार्ग के शत्रु हैं।

    गीता 3.34 श्रीकृष्ण

    इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ।
    तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥

    हिंदी अर्थइन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।

    रोमन में पढ़ें

    indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣhau vyavasthitau
    tayor na vaśham āgachchhet tau hyasya paripanthinau

    अध्याय 3 · कर्मयोग
  2. बदले की सोच कहाँ ले जाती है

    बार-बार सोचने से क्रोध, क्रोध से मोह, और अंत में बुद्धि का नाश — यह श्रृंखला धोखे के बाद सबसे तेज़ चलती है।

    गीता 2.62 से 2.63 श्रीकृष्ण

    इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

    ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
    सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ 2.62 ॥
    क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
    स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ 2.63 ॥

    हिंदी अर्थविषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate
    saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho ’bhijāyate
    krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ
    smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  3. द्वेष रहित, करुणा वाला

    जो किसी से द्वेष नहीं करता, मित्र-भाव और करुणा रखता है — भगवान उसे प्रिय मानते हैं।

    गीता 12.13 श्रीकृष्ण

    अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
    निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी ॥

    हिंदी अर्थसब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला? मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।

    रोमन में पढ़ें

    adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha
    nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī

    अध्याय 12 · भक्तियोग
  4. क्षमा दैवी गुण है

    तेज, क्षमा, धैर्य, और किसी से वैर न रखना — ये दैवी स्वभाव के गुण हैं।

    गीता 16.3 श्रीकृष्ण

    तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
    भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥

    हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।

    रोमन में पढ़ें

    tejaḥ kṣhamā dhṛitiḥ śhaucham adroho nāti-mānitā
    bhavanti sampadaṁ daivīm abhijātasya bhārata

    अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि धोखा देने वाले पर फिर आँख बंद करके भरोसा करो या अन्याय चुपचाप सहो। द्वेष छोड़ना और सावधान रहना — दोनों साथ चल सकते हैं।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।