“जिस पर सबसे ज़्यादा भरोसा किया, उसी ने धोखा दिया — अब क्या करूँ?”
गीता का छोटा जवाब
धोखे का दर्द सच्चा है। गीता राग-द्वेष को मन के शत्रु कहती है — बदले की आग सबसे पहले आपको ही जलाती है। उसका रास्ता है: द्वेष के बिना, पर विवेक के साथ आगे बढ़ना।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
द्वेष आपका ही शत्रु है
हर इंद्रिय के विषय में राग और द्वेष छिपे रहते हैं — इनके वश में मत होइए, ये कल्याण के मार्ग के शत्रु हैं।
हिंदी अर्थइन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।
रोमन में पढ़ें
indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣhau vyavasthitau
tayor na vaśham āgachchhet tau hyasya paripanthinau
2
बदले की सोच कहाँ ले जाती है
बार-बार सोचने से क्रोध, क्रोध से मोह, और अंत में बुद्धि का नाश — यह श्रृंखला धोखे के बाद सबसे तेज़ चलती है।
हिंदी अर्थविषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।
हिंदी अर्थसब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला? मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।
रोमन में पढ़ें
adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha
nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī
4
क्षमा दैवी गुण है
तेज, क्षमा, धैर्य, और किसी से वैर न रखना — ये दैवी स्वभाव के गुण हैं।
गीता 16.3श्रीकृष्ण
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।