“इतने सारे देवी-देवता हैं — किसकी पूजा करूँ, कौन सही है?”
गीता का छोटा जवाब
गीता हर सच्ची श्रद्धा का आदर करती है — भगवान कहते हैं कि जो जिस रूप की श्रद्धा से पूजा करता है, उसकी वही श्रद्धा वे दृढ़ करते हैं। सब राहें अंत में उन्हीं तक पहुँचती हैं।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
हर श्रद्धा दृढ़ होती है
जो भक्त जिस रूप की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, मैं उसकी उसी श्रद्धा को अटल करता हूँ।
गीता 7.21श्रीकृष्ण
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
हिंदी अर्थजो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ।
रोमन में पढ़ें
yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhati
tasya tasyāchalāṁ śhraddhāṁ tām eva vidadhāmyaham
2
सब एक ही मार्ग पर
जो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन्हें वैसे ही आश्रय देता हूँ — सब मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।
हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं।
रोमन में पढ़ें
ye yathā māṁ prapadyante tāns tathaiva bhajāmyaham
mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ
3
हर पूजा उन्हीं तक
जो श्रद्धा से दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मेरी ही पूजा करते हैं।
हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है।