जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · भगवान और पूजा

“इतने सारे देवी-देवता हैं — किसकी पूजा करूँ, कौन सही है?”

गीता का छोटा जवाब

गीता हर सच्ची श्रद्धा का आदर करती है — भगवान कहते हैं कि जो जिस रूप की श्रद्धा से पूजा करता है, उसकी वही श्रद्धा वे दृढ़ करते हैं। सब राहें अंत में उन्हीं तक पहुँचती हैं।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. हर श्रद्धा दृढ़ होती है

    जो भक्त जिस रूप की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, मैं उसकी उसी श्रद्धा को अटल करता हूँ।

    गीता 7.21 श्रीकृष्ण

    यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
    तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥

    हिंदी अर्थजो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ।

    रोमन में पढ़ें

    yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhati
    tasya tasyāchalāṁ śhraddhāṁ tām eva vidadhāmyaham

    अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
  2. सब एक ही मार्ग पर

    जो मुझे जैसे भजते हैं, मैं उन्हें वैसे ही आश्रय देता हूँ — सब मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं।

    गीता 4.11 श्रीकृष्ण

    ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
    मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

    हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं।

    रोमन में पढ़ें

    ye yathā māṁ prapadyante tāns tathaiva bhajāmyaham
    mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ

    अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
  3. हर पूजा उन्हीं तक

    जो श्रद्धा से दूसरे देवताओं को पूजते हैं, वे भी मेरी ही पूजा करते हैं।

    गीता 9.23 श्रीकृष्ण

    येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।
    तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥

    हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! जो भी भक्त (मनुष्य) श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वे भी करते हैं मेरा ही पूजन, पर करते है अविधिपूर्वक

    रोमन में पढ़ें

    ye ’pyanya-devatā-bhaktā yajante śhraddhayānvitāḥ
    te ’pi mām eva kaunteya yajantyavidhi-pūrvakam

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
  4. सब एक धागे में

    जैसे धागे में मणियाँ पिरोई होती हैं, वैसे ही सब कुछ मुझमें पिरोया है।

    गीता 7.7 श्रीकृष्ण

    मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय।
    मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥

    हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! मेरे बढ़कर (इस जगत् का) दूसरा कोई किञ्चिन्मात्र भी कारण नहीं है। जैसे सूतकी मणियाँ सूतके धागेमें पिरोयी हुई होती हैं, ऐसे ही यह सम्पूर्ण जगत् मेरेमें ही ओत-प्रोत है।

    रोमन में पढ़ें

    mattaḥ parataraṁ nānyat kiñchid asti dhanañjaya
    mayi sarvam idaṁ protaṁ sūtre maṇi-gaṇā iva

    अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता किसी की आस्था को छोटा दिखाने या बहस करने की बात नहीं करती।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।