“इतनी पूजा-प्रार्थना करता हूँ, फिर भी भगवान मेरी क्यों नहीं सुनते?”
गीता का छोटा जवाब
गीता कहती है कि भगवान हर सच्ची श्रद्धा को देखते हैं — दुख में पुकारने वाले भी उनके भक्त हैं। पर वे माँगी हुई चीज़ से ज़्यादा उसकी रक्षा करते हैं जो सच में आपके लिए अच्छा है।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
1
दुख में पुकारना भी भक्ति है
चार तरह के लोग भगवान को भजते हैं — दुखी, जानना चाहने वाले, कुछ पाने की इच्छा वाले, और ज्ञानी। कृष्ण कहते हैं ये सभी उदार हैं।
हिंदी अर्थहे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनव ! पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी -- ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।
उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥
हिंदी अर्थपहले कहे हुए सब-के-सब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है -- ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है।
रोमन में पढ़ें
udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam
āsthitaḥ sa hi yuktātmā mām evānuttamāṁ gatim
2
आपकी श्रद्धा दृढ़ होती है
जो जिस रूप की श्रद्धा से पूजा करता है, भगवान उसकी उसी श्रद्धा को दृढ़ करते हैं, और उसी से वह फल पाता है — जिसका विधान भी वे ही करते हैं।
गीता 7.21श्रीकृष्ण
यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥
हिंदी अर्थजो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ।
रोमन में पढ़ें
yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhati
tasya tasyāchalāṁ śhraddhāṁ tām eva vidadhāmyaham
गीता 7.22श्रीकृष्ण
स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
लभते च ततः कामान्मयैव विहितान् हि तान् ॥
हिंदी अर्थउस (मेरे द्वारा दृढ़ की हुई) श्रद्धासे युक्त होकर वह मनुष्य (सकामभावपूर्वक) उस देवताकी उपासना करता है और उसकी वह कामना पूरी भी होती है; परन्तु वह कामना-पूर्ति मेरे द्वारा विहित की हुई होती है।
रोमन में पढ़ें
sa tayā śhraddhayā yuktas tasyārādhanam īhate
labhate cha tataḥ kāmān mayaiva vihitān hi tān
3
वे आपका योगक्षेम संभालते हैं
जो भगवान पर भरोसा रखते हैं, उनके लिए जो ज़रूरी है वह देना और जो है उसकी रक्षा — यह भगवान स्वयं करते हैं।
गीता 9.22श्रीकृष्ण
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥
हिंदी अर्थजो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।
रोमन में पढ़ें
ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate
teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham
4
भाव देखा जाता है, सामग्री नहीं
पत्ता, फूल, फल या जल — जो भी प्रेम से अर्पण किया जाए, भगवान उसे स्वीकार करते हैं।
गीता 9.26श्रीकृष्ण
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
हिंदी अर्थजो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ।
रोमन में पढ़ें
patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati
tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ
✋ गीता यह नहीं कहती
गीता यह नहीं कहती कि पूजा एक सौदा है — इतना करो, उतना मिलेगा। न ही यह कि मनचाहा न मिलने का मतलब भगवान का नाराज़ होना है।