जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · भगवान और पूजा

“ध्यान या भक्ति में मन नहीं टिकता — कैसे शुरू करूँ?”

गीता का छोटा जवाब

गीता “धीरे-धीरे” से शुरू करने को कहती है। एक शांत जगह, सीधी कमर और थोड़ा समय — मन भटके तो बिना झुँझलाए लौटाइए। और अगर ध्यान कठिन लगे, तो कृष्ण ने आसान सीढ़ियाँ भी बताई हैं।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. धीरे-धीरे

    धैर्य वाली बुद्धि से मन को धीरे-धीरे भीतर लाओ। पहले दिन पाँच मिनट भी बहुत हैं।

    गीता 6.25 श्रीकृष्ण

    शनैः शनैरुपरमेद् बुद्ध्या धृतिगृहीतया।
    आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किञ्चिदपि चिन्तयेत् ॥

    हिंदी अर्थधैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे।

    रोमन में पढ़ें

    śhanaiḥ śhanair uparamed buddhyā dhṛiti-gṛihītayā
    ātma-sansthaṁ manaḥ kṛitvā na kiñchid api chintayet

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  2. बैठने का तरीका

    साफ़ जगह पर, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा आसन; शरीर, सिर और गर्दन सीधे और स्थिर — इधर-उधर देखे बिना।

    गीता 6.11 श्रीकृष्ण

    शुचौ देशे प्रतिष्ठाप्य स्थिरमासनमात्मनः।
    नात्युच्छ्रितं नातिनीचं चैलाजिनकुशोत्तरम् ॥

    हिंदी अर्थशुद्ध भूमिपर, जिसपर क्रमशः कुश, मृगछाला और वस्त्र बिछे हैं, जो न अत्यन्त ऊँचा है और न अत्यन्त नीचा, ऐसे अपने आसनको स्थिरस्थापन करके।

    रोमन में पढ़ें

    śhuchau deśhe pratiṣhṭhāpya sthiram āsanam ātmanaḥ
    nātyuchchhritaṁ nāti-nīchaṁ chailājina-kuśhottaram

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
    गीता 6.12 श्रीकृष्ण

    तत्रैकाग्रं मनः कृत्वा यतचित्तेन्द्रियक्रियः।
    उपविश्यासने युञ्ज्याद्योगमात्मविशुद्धये ॥

    हिंदी अर्थउस आसनपर बैठकर चित्त और इन्द्रियोंकी क्रियाओंको वशमें रखते हुए मनको एकाग्र करके अन्तःकरणकी शुद्धिके लिये योगका अभ्यास करे।

    रोमन में पढ़ें

    tatraikāgraṁ manaḥ kṛitvā yata-chittendriya-kriyaḥ
    upaviśhyāsane yuñjyād yogam ātma-viśhuddhaye

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
    गीता 6.13 श्रीकृष्ण

    समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः।
    संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥

    हिंदी अर्थकाया, शिर और ग्रीवाको सीधे अचल धारण करके तथा दिशाओंको न देखकर केवल अपनी नासिकाके अग्रभागको देखते हुए स्थिर होकर बैठे।

    रोमन में पढ़ें

    samaṁ kāya-śhiro-grīvaṁ dhārayann achalaṁ sthiraḥ
    samprekṣhya nāsikāgraṁ svaṁ diśhaśh chānavalokayan

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  3. मन का दीया

    जैसे हवा रहित जगह पर दीये की लौ नहीं काँपती, वैसे ही अभ्यास से मन भी स्थिर हो जाता है। आज लौ काँप रही है, तो भी अभ्यास जारी रखें।

    गीता 6.19 श्रीकृष्ण

    यथा दीपो निवातस्थो नेङ्गते सोपमा स्मृता।
    योगिनो यतचित्तस्य युञ्जतो योगमात्मनः ॥

    हिंदी अर्थजैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है।

    रोमन में पढ़ें

    yathā dīpo nivāta-stho neṅgate sopamā smṛitā
    yogino yata-chittasya yuñjato yogam ātmanaḥ

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  4. कठिन लगे तो आसान सीढ़ी

    मन स्थिर न हो तो अभ्यास करो; अभ्यास भी न हो सके तो भगवान के लिए काम करो; वह भी न हो तो अपने कर्मों के फल की चिंता छोड़ दो। हर व्यक्ति के लिए कोई न कोई सीढ़ी है।

    गीता 12.9 श्रीकृष्ण

    अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
    अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥

    हिंदी अर्थअगर तू मनको मेरेमें अचलभावसे स्थिर (अर्पण) करनेमें समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय ! अभ्यासयोगके द्वारा तू मेरी प्राप्तिकी इच्छा कर।

    रोमन में पढ़ें

    atha chittaṁ samādhātuṁ na śhaknoṣhi mayi sthiram
    abhyāsa-yogena tato mām ichchhāptuṁ dhanañjaya

    अध्याय 12 · भक्तियोग
    गीता 12.10 श्रीकृष्ण

    अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
    मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥

    हिंदी अर्थअगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा।

    रोमन में पढ़ें

    abhyāse ’py asamartho ’si mat-karma-paramo bhava
    mad-artham api karmāṇi kurvan siddhim avāpsyasi

    अध्याय 12 · भक्तियोग
    गीता 12.11 श्रीकृष्ण

    अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
    सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥

    हिंदी अर्थअगर मेरे योग-(समता-) के आश्रित हुआ तू इस(पूर्वश्लोकमें कहे गये साधन-) को भी करनेमें असमर्थ है, तो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके सम्पूर्ण कर्मोंके फलका त्याग कर।

    रोमन में पढ़ें

    athaitad apy aśhakto ’si kartuṁ mad-yogam āśhritaḥ
    sarva-karma-phala-tyāgaṁ tataḥ kuru yatātmavān

    अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि मन भटकने से आप भक्ति के योग्य नहीं, या ध्यान न कर पाने वाले पीछे रह जाते हैं।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।