“ध्यान या भक्ति में मन नहीं टिकता — कैसे शुरू करूँ?”
गीता का छोटा जवाब
गीता “धीरे-धीरे” से शुरू करने को कहती है। एक शांत जगह, सीधी कमर और थोड़ा समय — मन भटके तो बिना झुँझलाए लौटाइए। और अगर ध्यान कठिन लगे, तो कृष्ण ने आसान सीढ़ियाँ भी बताई हैं।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
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धीरे-धीरे
धैर्य वाली बुद्धि से मन को धीरे-धीरे भीतर लाओ। पहले दिन पाँच मिनट भी बहुत हैं।
हिंदी अर्थधैर्ययुक्त बुद्धिके द्वारा संसारसे धीरे-धीरे उपराम हो जाय और परमात्मस्वरूपमें मन-(बुद्धि-) को सम्यक् प्रकारसे स्थापन करके फिर कुछ भी चिन्तन न करे।
रोमन में पढ़ें
śhanaiḥ śhanair uparamed buddhyā dhṛiti-gṛihītayā
ātma-sansthaṁ manaḥ kṛitvā na kiñchid api chintayet
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बैठने का तरीका
साफ़ जगह पर, न बहुत ऊँचा न बहुत नीचा आसन; शरीर, सिर और गर्दन सीधे और स्थिर — इधर-उधर देखे बिना।
हिंदी अर्थजैसे स्पन्दनरहित वायुके स्थानमें स्थित दीपककी लौ चेष्टारहित हो जाती है, योगका अभ्यास करते हुए वश में किए हुए चित्तवाले योगीके चित्तकी वैसी ही उपमा कही गयी है।
मन स्थिर न हो तो अभ्यास करो; अभ्यास भी न हो सके तो भगवान के लिए काम करो; वह भी न हो तो अपने कर्मों के फल की चिंता छोड़ दो। हर व्यक्ति के लिए कोई न कोई सीढ़ी है।
हिंदी अर्थअगर मेरे योग-(समता-) के आश्रित हुआ तू इस(पूर्वश्लोकमें कहे गये साधन-) को भी करनेमें असमर्थ है, तो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके सम्पूर्ण कर्मोंके फलका त्याग कर।