अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #35 · आस्था अपनी आस्था बनाम दूसरों की

आपका दोस्त किसी और देवता या पद्धति से पूजा करता है, और घर वाले उसे गलत कहते हैं। आप क्या करेंगे?

आस्था के सवाल पर बहस अक्सर रिश्ते बिगाड़ देती है।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता श्रद्धा का आदर करती है — भगवान हर सच्ची श्रद्धा को दृढ़ करते हैं (7.21), और मनुष्य जैसी श्रद्धा रखता है, वैसा ही वह बनता है (17.3)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. घर वालों से सहमत हो जाऊँगा — गीता 7.21 में कहती है — जो भक्त जिस रूप की श्रद्धा से पूजा करना चाहता है, उसकी उसी श्रद्धा को मैं दृढ़ करता हूँ।

B. बहस करूँगा — अपनी बात रखना ठीक है, पर वाणी उद्वेग न करे (17.15)। बहस से किसी की श्रद्धा नहीं बदलती।

C. सबकी श्रद्धा का आदर करूँगा — यह गीता के करीब है — “जो मुझे जिस प्रकार भजते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; सब मनुष्य मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं” (4.11)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 7.21 श्रीकृष्ण

यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम् ॥

हिंदी अर्थजो-जो भक्त जिस-जिस देवताका श्रद्धापूर्वक पूजन करना चाहता है, उस-उस देवताके प्रति मैं उसकी श्रद्धाको दृढ़ कर देता हूँ।

रोमन में पढ़ें

yo yo yāṁ yāṁ tanuṁ bhaktaḥ śhraddhayārchitum ichchhati
tasya tasyāchalāṁ śhraddhāṁ tām eva vidadhāmyaham

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 4.11 श्रीकृष्ण

ये यथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्।
मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! जो भक्त जिस प्रकार मेरी शरण लेते हैं, मैं उन्हें उसी प्रकार आश्रय देता हूँ; क्योंकि सभी मनुष्य सब प्रकारसे मेरे मार्गका अनुकरण करते हैं।

रोमन में पढ़ें

ye yathā māṁ prapadyante tāns tathaiva bhajāmyaham
mama vartmānuvartante manuṣhyāḥ pārtha sarvaśhaḥ

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
गीता 9.23 श्रीकृष्ण

येऽप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयाऽन्विताः।
तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् ॥

हिंदी अर्थहे कुन्तीनन्दन! जो भी भक्त (मनुष्य) श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंका पूजन करते हैं, वे भी करते हैं मेरा ही पूजन, पर करते है अविधिपूर्वक

रोमन में पढ़ें

ye ’pyanya-devatā-bhaktā yajante śhraddhayānvitāḥ
te ’pi mām eva kaunteya yajantyavidhi-pūrvakam

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 17.3 श्रीकृष्ण

सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत।
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः ॥

हिंदी अर्थहे भारत ! सभी मनुष्योंकी श्रद्धा अन्तःकरणके अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है। इसलिये जो जैसी श्रद्धावाला है, वही उसका स्वरूप है अर्थात् वही उसकी निष्ठा -- स्थिति है।

रोमन में पढ़ें

sattvānurūpā sarvasya śhraddhā bhavati bhārata
śhraddhā-mayo ‘yaṁ puruṣho yo yach-chhraddhaḥ sa eva saḥ

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग
गीता 17.15 श्रीकृष्ण

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते ॥

हिंदी अर्थउद्वेग न करनेवाला, सत्य, प्रिय, हितकारक भाषण तथा स्वाध्याय और अभ्यास करना -- यह वाणी-सम्बन्धी तप कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

anudvega-karaṁ vākyaṁ satyaṁ priya-hitaṁ cha yat
svādhyāyābhyasanaṁ chaiva vāṅ-mayaṁ tapa uchyate

अध्याय 17 · श्रद्धात्रयविभागयोग

सभी दुविधाएँ देखें · जीवन-विषयों से गीता