नहीं। गीता भक्ति की सीढ़ी बताती है — ध्यान न हो सके तो अभ्यास, अभ्यास न हो सके तो भगवान के लिए कर्म, वह भी न हो सके तो कर्मफल का त्याग। भगवान विधि नहीं, भाव देखते हैं।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
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भक्ति की सीढ़ी
मन न लगे तो अभ्यास करो; अभ्यास न हो सके तो मेरे लिए कर्म करो; वह भी न हो सके तो कर्मफल का त्याग करो।
हिंदी अर्थअगर मेरे योग-(समता-) के आश्रित हुआ तू इस(पूर्वश्लोकमें कहे गये साधन-) को भी करनेमें असमर्थ है, तो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके सम्पूर्ण कर्मोंके फलका त्याग कर।
पत्ता, फूल, फल, जल — प्रेम से दिया गया सब स्वीकार है।
गीता 9.26श्रीकृष्ण
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
हिंदी अर्थजो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ।
रोमन में पढ़ें
patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati
tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ
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हर काम पूजा बन सकता है
जो करते हो, जो खाते हो, जो देते हो — सब मुझे अर्पण करो।
हिंदी अर्थजिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।