जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · भगवान और पूजा

“रोज़ पूजा-पाठ न कर पाऊँ तो क्या पाप लगेगा?”

गीता का छोटा जवाब

नहीं। गीता भक्ति की सीढ़ी बताती है — ध्यान न हो सके तो अभ्यास, अभ्यास न हो सके तो भगवान के लिए कर्म, वह भी न हो सके तो कर्मफल का त्याग। भगवान विधि नहीं, भाव देखते हैं।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. भक्ति की सीढ़ी

    मन न लगे तो अभ्यास करो; अभ्यास न हो सके तो मेरे लिए कर्म करो; वह भी न हो सके तो कर्मफल का त्याग करो।

    गीता 12.9 श्रीकृष्ण

    अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
    अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥

    हिंदी अर्थअगर तू मनको मेरेमें अचलभावसे स्थिर (अर्पण) करनेमें समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय ! अभ्यासयोगके द्वारा तू मेरी प्राप्तिकी इच्छा कर।

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    atha chittaṁ samādhātuṁ na śhaknoṣhi mayi sthiram
    abhyāsa-yogena tato mām ichchhāptuṁ dhanañjaya

    अध्याय 12 · भक्तियोग
    गीता 12.10 श्रीकृष्ण

    अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
    मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥

    हिंदी अर्थअगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा।

    रोमन में पढ़ें

    abhyāse ’py asamartho ’si mat-karma-paramo bhava
    mad-artham api karmāṇi kurvan siddhim avāpsyasi

    अध्याय 12 · भक्तियोग
    गीता 12.11 श्रीकृष्ण

    अथैतदप्यशक्तोऽसि कर्तुं मद्योगमाश्रितः।
    सर्वकर्मफलत्यागं ततः कुरु यतात्मवान् ॥

    हिंदी अर्थअगर मेरे योग-(समता-) के आश्रित हुआ तू इस(पूर्वश्लोकमें कहे गये साधन-) को भी करनेमें असमर्थ है, तो मन-इन्द्रियोंको वशमें करके सम्पूर्ण कर्मोंके फलका त्याग कर।

    रोमन में पढ़ें

    athaitad apy aśhakto ’si kartuṁ mad-yogam āśhritaḥ
    sarva-karma-phala-tyāgaṁ tataḥ kuru yatātmavān

    अध्याय 12 · भक्तियोग
  2. भाव ही पूजा है

    पत्ता, फूल, फल, जल — प्रेम से दिया गया सब स्वीकार है।

    गीता 9.26 श्रीकृष्ण

    पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
    तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥

    हिंदी अर्थजो भक्त पत्र, पुष्प, फल, जल आदि (यथासाध्य प्राप्त वस्तु) को भक्तिपूर्वक मेरे अर्पण करता है, उस मेरेमें तल्लीन हुए अन्तःकरणवाले भक्तके द्वारा भक्तिपूर्वक दिये हुए उपहार-(भेंट-) को मैं खा लेता हूँ।

    रोमन में पढ़ें

    patraṁ puṣhpaṁ phalaṁ toyaṁ yo me bhaktyā prayachchhati
    tadahaṁ bhaktyupahṛitam aśhnāmi prayatātmanaḥ

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
  3. हर काम पूजा बन सकता है

    जो करते हो, जो खाते हो, जो देते हो — सब मुझे अर्पण करो।

    गीता 9.27 श्रीकृष्ण

    यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
    यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

    हिंदी अर्थहे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।

    रोमन में पढ़ें

    yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat
    yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣhva mad-arpaṇam

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
  4. अपने काम से पूजा

    अपने स्वाभाविक कर्म से भगवान की पूजा करके मनुष्य सिद्धि पाता है।

    गीता 18.46 श्रीकृष्ण

    यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
    स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ॥

    हिंदी अर्थजिस परमात्मासे सम्पूर्ण प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है और जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्माका अपने कर्मके द्वारा पूजन करके मनुष्य सिद्धिको प्राप्त हो जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    yataḥ pravṛittir bhūtānāṁ yena sarvam idaṁ tatam
    sva-karmaṇā tam abhyarchya siddhiṁ vindati mānavaḥ

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता डर से पूजा करवाने की बात नहीं करती, न यह कहती है कि विधि छूटने से भगवान रूठ जाते हैं।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।