जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · भगवान और पूजा

“मैं भगवान से नाराज़ हूँ — क्या यह गलत है?”

गीता का छोटा जवाब

नहीं। गीता कहती है कि दुख में भगवान को पुकारने वाला “आर्त” भी उनका भक्त है। अर्जुन ने भी अपनी उलझन पूरी ईमानदारी से कृष्ण के सामने रखी थी। भगवान किसी से द्वेष नहीं रखते — नाराज़गी भी एक रिश्ता है।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. दुखी भक्त भी भक्त है

    कृष्ण चार तरह के भक्त गिनाते हैं — जिनमें “आर्त” यानी दुख में पुकारने वाला भी है। शिकायत करने वाला भी भगवान से ही बात कर रहा है।

    गीता 7.16 श्रीकृष्ण

    चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
    आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥

    हिंदी अर्थहे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनव ! पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी -- ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।

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    chatur-vidhā bhajante māṁ janāḥ sukṛitino ’rjuna
    ārto jijñāsur arthārthī jñānī cha bharatarṣhabha

    अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
  2. मन खोलकर कहिए

    अर्जुन ने अपनी कमज़ोरी और उलझन छिपाई नहीं — “मेरा मन मोहित है, मुझे बताइए, मैं आपका शिष्य हूँ।” भगवान के सामने सच्चा होना ही पहला कदम है।

    गीता 2.7 अर्जुन

    कार्पण्यदोषोपहतस्वभावः
    पृच्छामि त्वां धर्मसंमूढचेताः।
    यच्छ्रेयः स्यान्निश्चितं ब्रूहि तन्मे
    शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम् ॥

    हिंदी अर्थकायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।

    रोमन में पढ़ें

    kārpaṇya-doṣhopahata-svabhāvaḥ
    pṛichchhāmi tvāṁ dharma-sammūḍha-chetāḥ
    yach-chhreyaḥ syānniśhchitaṁ brūhi tanme
    śhiṣhyaste ’haṁ śhādhi māṁ tvāṁ prapannam

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  3. भगवान नाराज़ नहीं होते

    मैं सब प्राणियों में सम हूँ — न कोई मेरा द्वेषी है, न कोई प्रिय; पर जो प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें।

    गीता 9.29 श्रीकृष्ण

    समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
    ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥

    हिंदी अर्थमैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं  उनमें हूँ।

    रोमन में पढ़ें

    samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ
    ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
  4. भरोसा लौटेगा

    कृष्ण ने अर्जुन से प्रतिज्ञा करवाई — मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता। आज नाराज़गी है, कल यही रिश्ता और गहरा हो सकता है।

    गीता 9.31 श्रीकृष्ण

    क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
    कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥

    हिंदी अर्थवह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati
    kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि भगवान से नाराज़ होना पाप है, या इसकी कोई सज़ा मिलेगी।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।