नहीं। गीता कहती है कि दुख में भगवान को पुकारने वाला “आर्त” भी उनका भक्त है। अर्जुन ने भी अपनी उलझन पूरी ईमानदारी से कृष्ण के सामने रखी थी। भगवान किसी से द्वेष नहीं रखते — नाराज़गी भी एक रिश्ता है।
जवाब, कदम-दर-कदम
हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है
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दुखी भक्त भी भक्त है
कृष्ण चार तरह के भक्त गिनाते हैं — जिनमें “आर्त” यानी दुख में पुकारने वाला भी है। शिकायत करने वाला भी भगवान से ही बात कर रहा है।
हिंदी अर्थहे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनव ! पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी -- ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।
हिंदी अर्थकायरतारूप दोषसे तिरस्कृत स्वभाववाला और धर्मके विषयमें मोहित अन्तःकरणवाला मैं आपसे पूछता हूँ कि जो निश्चित कल्याण करनेवाली हो, वह मेरे लिये कहिये। मैं आपका शिष्य हूँ। आपके शरण हुए मुझे शिक्षा दीजिये।
मैं सब प्राणियों में सम हूँ — न कोई मेरा द्वेषी है, न कोई प्रिय; पर जो प्रेम से भजते हैं, वे मुझमें हैं और मैं उनमें।
गीता 9.29श्रीकृष्ण
समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः।
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥
हिंदी अर्थमैं सम्पूर्ण प्राणियोंमें समान हूँ। उन प्राणियोंमें न तो कोई मेरा द्वेषी है और न कोई प्रिय है। परन्तु जो भक्तिपूर्वक मेरा भजन करते हैं, वे मेरेमें हैं और मैं उनमें हूँ।
रोमन में पढ़ें
samo ’haṁ sarva-bhūteṣhu na me dveṣhyo ’sti na priyaḥ
ye bhajanti tu māṁ bhaktyā mayi te teṣhu chāpyaham
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भरोसा लौटेगा
कृष्ण ने अर्जुन से प्रतिज्ञा करवाई — मेरे भक्त का कभी नाश नहीं होता। आज नाराज़गी है, कल यही रिश्ता और गहरा हो सकता है।
गीता 9.31श्रीकृष्ण
क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ॥
हिंदी अर्थवह तत्काल (उसी क्षण) धर्मात्मा हो जाता है और निरन्तर रहनेवाली शान्तिको प्राप्त हो जाता है। हे कुन्तीनन्दन ! तुम प्रतिज्ञा करो कि मेरे भक्तका विनाश (पतन) नहीं होता।
रोमन में पढ़ें
kṣhipraṁ bhavati dharmātmā śhaśhvach-chhāntiṁ nigachchhati
kaunteya pratijānīhi na me bhaktaḥ praṇaśhyati
✋ गीता यह नहीं कहती
गीता यह नहीं कहती कि भगवान से नाराज़ होना पाप है, या इसकी कोई सज़ा मिलेगी।