जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · भगवान और पूजा

“घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों के बीच भक्ति कैसे करूँ?”

गीता का छोटा जवाब

गीता का पूरा उपदेश ही एक गृहस्थ योद्धा को दिया गया था। कृष्ण कहते हैं — हर समय मुझे याद रखो और अपना काम करो। कर्तव्य निभाते हुए भी मन कमल के पत्ते की तरह अछूता रह सकता है।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. काम करते हुए याद

    सब समय मेरा स्मरण करो और अपना कर्तव्य करो।

    गीता 8.7 श्रीकृष्ण

    तस्मात्सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युध्य च।
    मय्यर्पितमनोबुद्धिर्मामेवैष्यस्यसंशयम् ॥

    हिंदी अर्थइसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।

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    tasmāt sarveṣhu kāleṣhu mām anusmara yudhya cha
    mayyarpita-mano-buddhir mām evaiṣhyasyasanśhayam

    अध्याय 8 · अक्षरब्रह्मयोग
  2. कमल का पत्ता

    जो कर्म भगवान को अर्पण करके, आसक्ति छोड़कर करता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है जैसे पानी में कमल का पत्ता।

    गीता 5.10 श्रीकृष्ण

    ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
    लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥

    हिंदी अर्थजो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā karoti yaḥ
    lipyate na sa pāpena padma-patram ivāmbhasā

    अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
  3. असली संन्यासी कौन

    कर्मफल का सहारा न लेकर कर्तव्य करने वाला ही संन्यासी और योगी है — घर छोड़ने वाला नहीं।

    गीता 6.1 श्रीकृष्ण

    अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
    स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥

    हिंदी अर्थकर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī bhagavān uvācha
    anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ
    sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  4. हर काम अर्पण

    जो करते हो, खाते हो, देते हो — सब भगवान को अर्पण करो। यही गृहस्थ की पूजा है।

    गीता 9.27 श्रीकृष्ण

    यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।
    यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

    हिंदी अर्थहे कुन्तीपुत्र ! तू जो कुछ करता है, जो कुछ खाता है, जो कुछ यज्ञ करता है, जो कुछ दान देता है और जो कुछ तप करता है, वह सब मेरे अर्पण कर दे।

    रोमन में पढ़ें

    yat karoṣhi yad aśhnāsi yaj juhoṣhi dadāsi yat
    yat tapasyasi kaunteya tat kuruṣhva mad-arpaṇam

    अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि भक्ति के लिए घर-परिवार छोड़ना ज़रूरी है।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।