“घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों के बीच भक्ति कैसे करूँ?”
गीता का छोटा जवाब
गीता का पूरा उपदेश ही एक गृहस्थ योद्धा को दिया गया था। कृष्ण कहते हैं — हर समय मुझे याद रखो और अपना काम करो। कर्तव्य निभाते हुए भी मन कमल के पत्ते की तरह अछूता रह सकता है।
हिंदी अर्थइसलिये तू सब समयमें मेरा स्मरण कर और युद्ध भी कर। मेरेमें मन और बुद्धि अर्पित करनेवाला तू निःसन्देह मेरेको ही प्राप्त होगा।
रोमन में पढ़ें
tasmāt sarveṣhu kāleṣhu mām anusmara yudhya cha
mayyarpita-mano-buddhir mām evaiṣhyasyasanśhayam
2
कमल का पत्ता
जो कर्म भगवान को अर्पण करके, आसक्ति छोड़कर करता है, वह पाप से वैसे ही अछूता रहता है जैसे पानी में कमल का पत्ता।
गीता 5.10श्रीकृष्ण
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥
हिंदी अर्थजो (भक्तियोगी) सम्पूर्ण कर्मोंको भगवान् में अर्पण करके और आसक्तिका त्याग करके कर्म करता है, वह जलसे कमलके पत्तेकी तरह पापसे लिप्त नहीं होता।
रोमन में पढ़ें
brahmaṇyādhāya karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā karoti yaḥ
lipyate na sa pāpena padma-patram ivāmbhasā
3
असली संन्यासी कौन
कर्मफल का सहारा न लेकर कर्तव्य करने वाला ही संन्यासी और योगी है — घर छोड़ने वाला नहीं।
गीता 6.1श्रीकृष्ण
अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः।
स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ॥
हिंदी अर्थकर्मफलका आश्रय न लेकर जो कर्तव्यकर्म करता है, वही संन्यासी तथा योगी है; और केवल अग्निका त्याग करनेवाला संन्यासी नहीं होता तथा केवल क्रियाओंका त्याग करनेवाला योगी नहीं होता।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
anāśhritaḥ karma-phalaṁ kāryaṁ karma karoti yaḥ
sa sannyāsī cha yogī cha na niragnir na chākriyaḥ
4
हर काम अर्पण
जो करते हो, खाते हो, देते हो — सब भगवान को अर्पण करो। यही गृहस्थ की पूजा है।