अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #34 · आस्था शिकायत बनाम भरोसा

बहुत प्रार्थना की, फिर भी जो चाहा नहीं मिला। भगवान पर भरोसा डगमगा रहा है। आप क्या करेंगे?

मन में सवाल है — क्या सच में कोई सुन रहा है?

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता चार तरह के भक्त बताती है — दुःखी, कुछ चाहने वाले, जिज्ञासु और ज्ञानी (7.16)। सब उदार हैं, पर सबसे प्रिय वह है जो बिना शर्त प्रेम करता है (7.17)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. पूजा छोड़ दूँगा — गीता कहती है कि संशय में डूबे मनुष्य को न यह लोक सुख देता है, न परलोक (4.40)। भरोसा डगमगाना मानवीय है — उसे अंतिम मान लेना नहीं।

B. और ज़्यादा माँगूँगा — गीता माँगने वाले भक्त को भी “उदार” कहती है (7.16, 7.18), पर यह भी कहती है कि कामना से की गई उपासना का फल अंतवाला होता है (7.23)।

C. माँगना कम, भरोसा ज़्यादा — यह गीता के करीब है — जो अनन्य भाव से भजते हैं, उनका योगक्षेम भगवान स्वयं वहन करते हैं (9.22)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 7.16 श्रीकृष्ण

चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥

हिंदी अर्थहे भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ अर्जुनव ! पवित्र कर्म करनेवाले अर्थार्थी, आर्त, जिज्ञासु और ज्ञानी अर्थात् प्रेमी -- ये चार प्रकारके मनुष्य मेरा भजन करते हैं अर्थात् मेरे शरण होते हैं।

रोमन में पढ़ें

chatur-vidhā bhajante māṁ janāḥ sukṛitino ’rjuna
ārto jijñāsur arthārthī jñānī cha bharatarṣhabha

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 7.17 श्रीकृष्ण

तेषां ज्ञानी नित्ययुक्त एकभक्तिर्विशिष्यते।
प्रियो हि ज्ञानिनोऽत्यर्थमहं स च मम प्रियः ॥

हिंदी अर्थउन चार भक्तोंमें मेरेमें निरन्तर लगा हुआ, अनन्यभक्तिवाला ज्ञानी अर्थात् प्रेमी भक्त श्रेष्ठ है; क्योंकि ज्ञानी भक्तको मैं अत्यन्त प्रिय हूँ और वह भी मेरेको अत्यन्त प्रिय है।

रोमन में पढ़ें

teṣhāṁ jñānī nitya-yukta eka-bhaktir viśhiṣhyate
priyo hi jñānino ’tyartham ahaṁ sa cha mama priyaḥ

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 7.18 श्रीकृष्ण

उदाराः सर्व एवैते ज्ञानी त्वात्मैव मे मतम्।
आस्थितः स हि युक्तात्मा मामेवानुत्तमां गतिम् ॥

हिंदी अर्थपहले कहे हुए सब-के-सब भक्त बड़े उदार (श्रेष्ठ भाववाले) हैं। परन्तु ज्ञानी (प्रेमी) तो मेरा स्वरूप ही है -- ऐसा मेरा मत है। कारण कि वह युक्तात्मा है और जिससे श्रेष्ठ दूसरी कोई गति नहीं है, ऐसे मेरेमें ही दृढ़ आस्थावाला है।

रोमन में पढ़ें

udārāḥ sarva evaite jñānī tvātmaiva me matam
āsthitaḥ sa hi yuktātmā mām evānuttamāṁ gatim

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 7.23 श्रीकृष्ण

अन्तवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम्।
देवान्देवयजो यान्ति मद्भक्ता यान्ति मामपि ॥

हिंदी अर्थपरन्तु उन अल्पबुद्धिवाले मनुष्योंको उन देवताओंकी आराधनाका फल अन्तवाला (नाशवान्) ही मिलता है। देवताओंका पूजन करनेवाले देवताओंको प्राप्त होते हैं और मेरे भक्त मेरे ही प्राप्त होते हैं।

रोमन में पढ़ें

antavat tu phalaṁ teṣhāṁ tad bhavatyalpa-medhasām
devān deva-yajo yānti mad-bhaktā yānti mām api

अध्याय 7 · ज्ञानविज्ञानयोग
गीता 9.22 श्रीकृष्ण

अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते।
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् ॥

हिंदी अर्थजो अनन्य भक्त मेरा चिन्तन करते हुए मेरी उपासना करते हैं, मेरेमें निरन्तर लगे हुए उन भक्तोंका योगक्षेम (अप्राप्तकी प्राप्ति और प्राप्तकी रक्षा) मैं वहन करता हूँ।

रोमन में पढ़ें

ananyāśh chintayanto māṁ ye janāḥ paryupāsate
teṣhāṁ nityābhiyuktānāṁ yoga-kṣhemaṁ vahāmyaham

अध्याय 9 · राजविद्याराजगुह्ययोग
गीता 4.40 श्रीकृष्ण

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति।
नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥

हिंदी अर्थविवेकहीन और श्रद्धारहित संशयात्मा मनुष्यका पतन हो जाता है। ऐसे संशयात्मा मनुष्यके लिये न यह लोक  है न परलोक है और न सुख ही है।

रोमन में पढ़ें

ajñaśh chāśhraddadhānaśh cha sanśhayātmā vinaśhyati
nāyaṁ loko ’sti na paro na sukhaṁ sanśhayātmanaḥ

अध्याय 4 · ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

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