अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #29 · मन और आदतें तनाव बनाम घर

दिनभर का तनाव घर आकर परिवार पर गुस्से में निकल जाता है। आप क्या करेंगे?

बाद में पछतावा होता है, पर अगले दिन फिर वही।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता क्रोध की पूरी श्रृंखला बताती है — कामना से क्रोध, क्रोध से मोह, मोह से बुद्धि का नाश (2.62–63)। उपाय है वेग को सहना (5.23) और जड़ को पहचानना।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. थोड़ा चलता है — गीता क्रोध को नरक के तीन द्वारों में गिनती है (16.21) — किसी पर भी निकले, वह क्रोध ही है। और क्रोध से बुद्धि का नाश तक होता है (2.63)।

B. गुस्सा आते ही वहाँ से हट जाऊँगा — 5.23 कहता है — जो काम-क्रोध के वेग को सह ले, वही सुखी है। हट जाना उस वेग को गुज़र जाने देना है।

C. तनाव की जड़ पर काम करूँगा — यह गीता की सबसे गहरी बात के करीब है — क्रोध की जड़ कामना में है (3.37, 2.62)। जड़ समझे बिना क्रोध बार-बार लौटता है।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 2.62 से 2.63 श्रीकृष्ण

इन दोनों श्लोकों का अर्थ एक साथ दिया गया है

ध्यायतो विषयान्पुंसः सङ्गस्तेषूपजायते।
सङ्गात् संजायते कामः कामात्क्रोधोऽभिजायते ॥ 2.62 ॥
क्रोधाद्भवति संमोहः संमोहात्स्मृतिविभ्रमः।
स्मृतिभ्रंशाद् बुद्धिनाशो बुद्धिनाशात्प्रणश्यति ॥ 2.63 ॥

हिंदी अर्थविषयोंका चिन्तन करनेवाले मनुष्यकी उन विषयोंमें आसक्ति पैदा हो जाती है। आसक्तिसे कामना पैदा होती है। कामनासे क्रोध पैदा होता है। क्रोध होनेपर सम्मोह (मूढ़भाव) हो जाता है। सम्मोहसे स्मृति भ्रष्ट हो जाती है। स्मृति भ्रष्ट होनेपर बुद्धिका नाश हो जाता है। बुद्धिका नाश होनेपर मनुष्यका पतन हो जाता है।

रोमन में पढ़ें

dhyāyato viṣhayān puṁsaḥ saṅgas teṣhūpajāyate
saṅgāt sañjāyate kāmaḥ kāmāt krodho ’bhijāyate
krodhād bhavati sammohaḥ sammohāt smṛiti-vibhramaḥ
smṛiti-bhranśhād buddhi-nāśho buddhi-nāśhāt praṇaśhyati

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 3.37 श्रीकृष्ण

काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः।
महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥

हिंदी अर्थरजोगुणसे उत्पन्न हुआ  यह काम ही क्रोध  है। यह बहुत खानेवाला और महापापी है। इस विषयमें तू इसको ही वैरी जान।

रोमन में पढ़ें

śhrī bhagavān uvācha
kāma eṣha krodha eṣha rajo-guṇa-samudbhavaḥ
mahāśhano mahā-pāpmā viddhyenam iha vairiṇam

अध्याय 3 · कर्मयोग
गीता 5.23 श्रीकृष्ण

शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात्।
कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥

हिंदी अर्थइस मनुष्य-शरीरमें जो कोई (मनुष्य) शरीर छूटनेसे पहले ही काम-क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले वेगको सहन करनेमें समर्थ होता है, वह नर योगी है और वही सुखी है।

रोमन में पढ़ें

śhaknotīhaiva yaḥ soḍhuṁ prāk śharīra-vimokṣhaṇāt
kāma-krodhodbhavaṁ vegaṁ sa yuktaḥ sa sukhī naraḥ

अध्याय 5 · कर्मसंन्यासयोग
गीता 16.21 श्रीकृष्ण

त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत् ॥

हिंदी अर्थकाम, क्रोध और लोभ -- ये तीन प्रकारके नरकके दरवाजे जीवात्माका पतन करनेवाले हैं, इसलिये इन तीनोंका त्याग कर देना चाहिये।

रोमन में पढ़ें

tri-vidhaṁ narakasyedaṁ dvāraṁ nāśhanam ātmanaḥ
kāmaḥ krodhas tathā lobhas tasmād etat trayaṁ tyajet

अध्याय 16 · दैवासुरसम्पद्विभागयोग

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