जिस दोस्त पर सबसे ज़्यादा भरोसा था, उसने पीठ पीछे आपकी बुराई की। आप क्या करेंगे?
बात आप तक किसी और के ज़रिए पहुँची है।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता धोखे को सही नहीं ठहराती, पर बदले की आग को भी नहीं। क्षमा, बैर न रखना और सच बोलना — तीनों दैवी गुणों में गिने गए हैं (16.1–3)।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. मैं भी उसकी पोल खोल दूँगा — बदले में बुराई करना वही करना है जो उसने किया — गीता चुगली न करने (अपैशुनम्) को दैवी गुण कहती है (16.2)।
B. बिना कुछ कहे दोस्ती तोड़ दूँगा — दूरी बनाना समझ में आता है। पर भीतर द्वेष पलता रहे, तो गीता उसे मन का शत्रु कहती है (3.34)।
C. सीधे उससे बात करूँगा — सच्चाई से सीधी बात — गीता का वाणी-तप: सत्य, प्रिय और हितकारी (17.15)।
D. माफ़ कर दूँगा, पर दूरी रखूँगा — यह गीता के क्षमा और अद्रोह के करीब है (16.3)। क्षमा का अर्थ अंधा भरोसा नहीं — 6.9 सुहृद् और वैरी, दोनों में सम-बुद्धि की बात करता है।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता।
भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ॥
हिंदी अर्थतेज (प्रभाव), क्षमा, धैर्य, शरीरकी शुद्धि, वैरभावका न रहना और मानको न चाहना, हे भरतवंशी अर्जुन ! ये सभी दैवी सम्पदाको प्राप्त हुए मनुष्यके लक्षण हैं।
हिंदी अर्थइन्द्रिय-इन्द्रियके अर्थमें (प्रत्येक इन्द्रियके प्रत्येक विषयमें) मनुष्यके राग और द्वेष व्यवस्थासे (अनुकूलता और प्रतिकूलताको लेकर) स्थित हैं। मनुष्यको उन दोनोंके वशमें नहीं होना चाहिये; क्योंकि वे दोनों ही इसके (पारमार्थिक मार्गमें विघ्न डालनेवाले) शत्रु हैं।
रोमन में पढ़ें
indriyasyendriyasyārthe rāga-dveṣhau vyavasthitau
tayor na vaśham āgachchhet tau hyasya paripanthinau
हिंदी अर्थसब प्राणियोंमें द्वेषभावसे रहित, सबका मित्र (प्रेमी) और दयालु, ममतारहित, अहंकाररहित, सुखदुःखकी प्राप्तिमें सम, क्षमाशील, निरन्तर सन्तुष्ट, योगी, शरीरको वशमें किये हुए, दृढ़ निश्चयवाला? मेरेमें अर्पित मनबुद्धिवाला जो मेरा भक्त है, वह मेरेको प्रिय है।
रोमन में पढ़ें
adveṣhṭā sarva-bhūtānāṁ maitraḥ karuṇa eva cha
nirmamo nirahankāraḥ sama-duḥkha-sukhaḥ kṣhamī
santuṣhṭaḥ satataṁ yogī yatātmā dṛiḍha-niśhchayaḥ
mayy arpita-mano-buddhir yo mad-bhaktaḥ sa me priyaḥ
गीता 6.9श्रीकृष्ण
सुहृन्मित्रार्युदासीनमध्यस्थद्वेष्यबन्धुषु।
साधुष्वपि च पापेषु समबुद्धिर्विशिष्यते ॥
हिंदी अर्थसुहृद्, मित्र, वैरी, उदासीन, मध्यस्थ, द्वेष्य और सम्बन्धियोंमें तथा साधु-आचरण करनेवालोंमें और पाप-आचरण करनेवालोंमें भी समबुद्धिवाला मनुष्य श्रेष्ठ है।
रोमन में पढ़ें
suhṛin-mitrāryudāsīna-madhyastha-dveṣhya-bandhuṣhu
sādhuṣhvapi cha pāpeṣhu sama-buddhir viśhiṣhyate