अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #09 · मन और आदतें साधना बनाम भटकता मन

ध्यान, पूजा या पढ़ाई शुरू की, पर मन बार-बार भटक जाता है। आप क्या करेंगे?

अर्जुन ने भी कहा था — मन को वश में करना वायु को रोकने जैसा कठिन है (6.34)।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता मानती है कि मन चंचल है — श्रीकृष्ण अर्जुन की बात से सहमत होते हैं। उपाय है धैर्य के साथ, बिना ऊबे अभ्यास (6.23)।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. छोड़ दूँगा — अर्जुन ने यही डर पूछा था — जो बीच में भटक जाए, उसका क्या होगा (6.37)? उत्तर में गीता कहती है कि कल्याण का काम करने वाले की दुर्गति नहीं होती (6.40)।

B. ज़बरदस्ती मन को बाँधूँगा — प्रयास अच्छा है, पर गीता हठ नहीं, “अभ्यास और वैराग्य” बताती है (6.35) — मन जहाँ-जहाँ जाए, वहाँ से धीरे से लौटाना (6.26)।

C. रोज़ थोड़ा-थोड़ा करूँगा — यह गीता के क्रम के करीब है — मन स्थिर न हो तो अभ्यास करो, अभ्यास भी न हो सके तो कर्म भगवान के लिए करो (12.9–10)। थोड़ा-सा साधन भी व्यर्थ नहीं जाता (2.40)।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 6.34 अर्जुन

चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम्।
तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥

हिंदी अर्थक्योंकि हे कृष्ण ! मन बड़ा ही चञ्चल, प्रमथनशील, दृढ़ (जिद्दी) और बलवान् है। उसका निग्रह करना मैं वायुकी तरह अत्यन्त कठिन मानता हूँ।

रोमन में पढ़ें

chañchalaṁ hi manaḥ kṛiṣhṇa pramāthi balavad dṛiḍham
tasyāhaṁ nigrahaṁ manye vāyor iva su-duṣhkaram

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.35 श्रीकृष्ण

असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलं।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥

हिंदी अर्थहे महाबाहो ! यह मन बड़ा चञ्चल है और इसका निग्रह करना भी बड़ा कठिन है -- यह तुम्हारा कहना बिलकुल ठीक है। परन्तु हे कुन्तीनन्दन ! अभ्यास और वैराग्यके द्वारा इसका निग्रह किया जाता है।

रोमन में पढ़ें

śhrī bhagavān uvācha
asanśhayaṁ mahā-bāho mano durnigrahaṁ chalam
abhyāsena tu kaunteya vairāgyeṇa cha gṛihyate

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.26 श्रीकृष्ण

यतो यतो निश्चरति मनश्चञ्चलमस्थिरम्।
ततस्ततो नियम्यैतदात्मन्येव वशं नयेत् ॥

हिंदी अर्थयह अस्थिर और चञ्चल मन जहाँ-जहाँ विचरण करता है, वहाँ-वहाँसे हटाकर इसको एक परमात्मामें ही  लगाये।

रोमन में पढ़ें

yato yato niśhcharati manaśh chañchalam asthiram
tatas tato niyamyaitad ātmanyeva vaśhaṁ nayet

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.37 अर्जुन

अयतिः श्रद्धयोपेतो योगाच्चलितमानसः।
अप्राप्य योगसंसिद्धिं कां गतिं कृष्ण गच्छति ॥

हिंदी अर्थहे कृष्ण ! जिसकी साधनमें श्रद्धा है, पर जिसका प्रयत्न शिथिल है, वह अन्तसमयमें अगर योगसे विचलितमना हो जाय, तो वह योगसिद्धिको प्राप्त न करके किस गतिको चला जाता है?

रोमन में पढ़ें

arjuna uvācha
ayatiḥ śhraddhayopeto yogāch chalita-mānasaḥ
aprāpya yoga-sansiddhiṁ kāṅ gatiṁ kṛiṣhṇa gachchhati

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 6.40 श्रीकृष्ण

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।

रोमन में पढ़ें

śhrī bhagavān uvācha
pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate
na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 12.9 श्रीकृष्ण

अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्।
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जय ॥

हिंदी अर्थअगर तू मनको मेरेमें अचलभावसे स्थिर (अर्पण) करनेमें समर्थ नहीं है, तो हे धनञ्जय ! अभ्यासयोगके द्वारा तू मेरी प्राप्तिकी इच्छा कर।

रोमन में पढ़ें

atha chittaṁ samādhātuṁ na śhaknoṣhi mayi sthiram
abhyāsa-yogena tato mām ichchhāptuṁ dhanañjaya

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 12.10 श्रीकृष्ण

अभ्यासेऽप्यसमर्थोऽसि मत्कर्मपरमो भव।
मदर्थमपि कर्माणि कुर्वन् सिद्धिमवाप्स्यसि ॥

हिंदी अर्थअगर तू अभ्यास-(योग-) में भी असमर्थ है, तो मेरे लिये कर्म करनेके परायण हो जा। मेरे लिये कर्मोंको करता हुआ भी तू सिद्धिको प्राप्त हो जायगा।

रोमन में पढ़ें

abhyāse ’py asamartho ’si mat-karma-paramo bhava
mad-artham api karmāṇi kurvan siddhim avāpsyasi

अध्याय 12 · भक्तियोग
गीता 6.23 श्रीकृष्ण

तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योगसंज्ञितम्।
स निश्चयेन योक्तव्यो योगोऽनिर्विण्णचेतसा ॥

हिंदी अर्थजिसमें दुःखोंके संयोगका ही वियोग है, उसीको 'योग' नामसे जानना चाहिये। (वह योग जिस ध्यानयोगका लक्ष्य है,) उस ध्यानयोगका अभ्यास न उकताये हुए चित्तसे निश्चयपूर्वक करना चाहिये।

रोमन में पढ़ें

taṁ vidyād duḥkha-sanyoga-viyogaṁ yogasaṅjñitam
sa niśhchayena yoktavyo yogo ’nirviṇṇa-chetasā

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 2.40 श्रीकृष्ण

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥

हिंदी अर्थमनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।

रोमन में पढ़ें

nehābhikrama-nāśho ’sti pratyavāyo na vidyate
svalpam apyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt

अध्याय 2 · सांख्ययोग

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