जीवन के सवाल
कुंडलीपंचांग
जीवन का सवाल · काम और मेहनत

“इतनी मेहनत करता हूँ, फिर भी उसका फल क्यों नहीं मिलता?”

गीता का छोटा जवाब

गीता कहती है — अधिकार कर्म पर है, फल पर नहीं; क्योंकि परिणाम के और भी कारण होते हैं। पर अच्छे मार्ग पर किया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता — और नतीजे की चिंता छोड़ते ही वही मेहनत हल्की और बेहतर हो जाती है।

जवाब, कदम-दर-कदम

हर कदम के साथ वह श्लोक, जिस पर वह आधारित है

  1. अधिकार कर्म पर है

    आपका अधिकार कर्म करने पर है, फल पर कभी नहीं — और फल न मिलने के डर से कर्म छोड़ने का भी विचार मत कीजिए।

    गीता 2.47 श्रीकृष्ण

    कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
    मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

    हिंदी अर्थकर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।

    रोमन में पढ़ें

    karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana
    mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  2. नतीजे के और भी कारण हैं

    परिणाम पाँच कारणों से बनता है — आपका प्रयास उनमें से एक है।

    गीता 18.14 श्रीकृष्ण

    अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्।
    विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ॥

    हिंदी अर्थइसमें (कर्मोंकी सिद्धिमें) अधिष्ठान तथा कर्ता और अनेक प्रकारके करण एवं विविध प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ कारण दैव (संस्कार) है।

    रोमन में पढ़ें

    adhiṣhṭhānaṁ tathā kartā karaṇaṁ cha pṛithag-vidham
    vividhāśh cha pṛithak cheṣhṭā daivaṁ chaivātra pañchamam

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
  3. सफलता-असफलता में सम

    सिद्धि और असिद्धि में सम रहकर कर्म करना ही योग है।

    गीता 2.48 श्रीकृष्ण

    योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
    सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

    हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya
    siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
  4. प्रयास व्यर्थ नहीं जाता

    इस मार्ग में शुरुआत का नाश नहीं होता, और अच्छा करने वाला कभी दुर्गति को नहीं पाता।

    गीता 2.40 श्रीकृष्ण

    नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
    स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥

    हिंदी अर्थमनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।

    रोमन में पढ़ें

    nehābhikrama-nāśho ’sti pratyavāyo na vidyate
    svalpam apyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt

    अध्याय 2 · सांख्ययोग
    गीता 6.40 श्रीकृष्ण

    पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
    नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥

    हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।

    रोमन में पढ़ें

    śhrī bhagavān uvācha
    pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate
    na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati

    अध्याय 6 · ध्यानयोग
  5. अच्छे कर्ता की पहचान

    जो धैर्य और उत्साह से भरा हो, और सफलता-असफलता में निर्विकार रहे — वह सात्त्विक कर्ता है।

    गीता 18.26 श्रीकृष्ण

    मुक्तसङ्गोऽनहंवादी धृत्युत्साहसमन्वितः।
    सिद्ध्यसिद्ध्योर्निर्विकारः कर्ता सात्त्विक उच्यते ॥

    हिंदी अर्थजो कर्ता रागरहित, अनहंवादी, धैर्य और उत्साहयुक्त तथा सिद्धि और असिद्धिमें निर्विकार है, वह सात्त्विक कहा जाता है।

    रोमन में पढ़ें

    mukta-saṅgo ‘nahaṁ-vādī dhṛity-utsāha-samanvitaḥ
    siddhy-asiddhyor nirvikāraḥ kartā sāttvika uchyate

    अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता यह नहीं कहती

गीता यह नहीं कहती कि नतीजे की परवाह ही न करो या मेहनत बेकार है। वह कहती है — नतीजे की चिंता को मेहनत पर हावी मत होने दो।

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जवाब और उनकी व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात ऊपर दिए श्लोकों में पढ़ें। हिंदी अर्थ स्वामी रामसुखदास जी के अनुवाद पर आधारित है।