पूरी मेहनत की है, पर डर है कि नतीजा अच्छा नहीं आएगा। अब आप क्या करेंगे?
परीक्षा, इंटरव्यू, नया काम — तैयारी हमारे हाथ में है, परिणाम पूरी तरह नहीं।
एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।
आपकी सोच बनाम गीता का कोण
यह तुलना है, निर्णय नहीं
आपने चुना
—
गीता का कोण
गीता कर्म छोड़ने को नहीं, फल की आसक्ति छोड़ने को कहती है। प्रयास पूरे मन से हो, और परिणाम के बाद भी मन का संतुलन बना रहे — इसी को “समत्व” कहा गया है।
आपके चुनाव पर गीता की नज़र
A. पीछे हट जाऊँगा — गीता सीधे कहती है — अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो (2.47)। और कष्ट या डर के कारण कर्म छोड़ना “राजस त्याग” है, जिसका फल भी नहीं मिलता (18.8)।
B. लगा रहूँगा, पर बेचैनी के साथ — आप कर्म नहीं छोड़ रहे — यह गीता के अनुरूप है। पर 2.48 कहता है कि सिद्धि-असिद्धि में सम रहकर कर्म करो; फल की चिंता उसी कर्म की ऊर्जा कम करती है।
C. पूरी कोशिश करूँगा, फिर जो हो — यह गीता के कर्मयोग के सबसे करीब है — कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं (2.47)। 6.40 भरोसा देता है कि अच्छे मार्ग पर किया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।
यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।
इन श्लोकों में देखें
इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक
गीता 2.47श्रीकृष्ण
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
हिंदी अर्थकर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।
रोमन में पढ़ें
karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana
mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi
हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।
रोमन में पढ़ें
yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya
siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate
गीता 2.50श्रीकृष्ण
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥
हिंदी अर्थबुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।
हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।
रोमन में पढ़ें
śhrī bhagavān uvācha
pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate
na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati
गीता 2.40श्रीकृष्ण
नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥
हिंदी अर्थमनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।