अर्जुन की दुविधा
कुंडलीपंचांग
दुविधा #02 · पढ़ाई मेहनत बनाम नतीजे का डर

पूरी मेहनत की है, पर डर है कि नतीजा अच्छा नहीं आएगा। अब आप क्या करेंगे?

परीक्षा, इंटरव्यू, नया काम — तैयारी हमारे हाथ में है, परिणाम पूरी तरह नहीं।

एक विकल्प चुनें। उसके बाद गीता का दृष्टिकोण दिखेगा — आपके चुनाव को “पास” या “फ़ेल” नहीं किया जाएगा।

आपकी सोच बनाम गीता का कोण

यह तुलना है, निर्णय नहीं

आपने चुना

—

गीता का कोण

गीता कर्म छोड़ने को नहीं, फल की आसक्ति छोड़ने को कहती है। प्रयास पूरे मन से हो, और परिणाम के बाद भी मन का संतुलन बना रहे — इसी को “समत्व” कहा गया है।

आपके चुनाव पर गीता की नज़र

A. पीछे हट जाऊँगा — गीता सीधे कहती है — अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो (2.47)। और कष्ट या डर के कारण कर्म छोड़ना “राजस त्याग” है, जिसका फल भी नहीं मिलता (18.8)।

B. लगा रहूँगा, पर बेचैनी के साथ — आप कर्म नहीं छोड़ रहे — यह गीता के अनुरूप है। पर 2.48 कहता है कि सिद्धि-असिद्धि में सम रहकर कर्म करो; फल की चिंता उसी कर्म की ऊर्जा कम करती है।

C. पूरी कोशिश करूँगा, फिर जो हो — यह गीता के कर्मयोग के सबसे करीब है — कर्म पर अधिकार, फल पर नहीं (2.47)। 6.40 भरोसा देता है कि अच्छे मार्ग पर किया प्रयास कभी व्यर्थ नहीं जाता।

यह व्याख्या SachiBhakti की है; मूल बात नीचे दिए श्लोकों में पढ़ें।

इन श्लोकों में देखें

इस दुविधा से जुड़े गीता के श्लोक

गीता 2.47 श्रीकृष्ण

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥

हिंदी अर्थकर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं। अतः तू कर्मफलका हेतु भी मत बन और तेरी अकर्मण्यतामें भी आसक्ति न हो।

रोमन में पढ़ें

karmaṇy-evādhikāras te mā phaleṣhu kadāchana
mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stvakarmaṇi

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.48 श्रीकृष्ण

योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते ॥

हिंदी अर्थहे धनञ्जय ! तू आसक्तिका त्याग करके सिद्धि-असिद्धिमें सम होकर योगमें स्थित हुआ कर्मोंको कर; क्योंकि समत्व ही योग कहा जाता है।

रोमन में पढ़ें

yoga-sthaḥ kuru karmāṇi saṅgaṁ tyaktvā dhanañjaya
siddhy-asiddhyoḥ samo bhūtvā samatvaṁ yoga uchyate

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 2.50 श्रीकृष्ण

बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम् ॥

हिंदी अर्थबुद्धि-(समता) से युक्त मनुष्य यहाँ जीवित अवस्थामें ही पुण्य और पाप दोनोंका त्याग कर देता है। अतः तू योग-(समता-) में लग जा, क्योंकि योग ही कर्मोंमें कुशलता है।

रोमन में पढ़ें

buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛita-duṣhkṛite
tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśhalam

अध्याय 2 · सांख्ययोग
गीता 18.8 श्रीकृष्ण

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्।
स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत् ॥

हिंदी अर्थजो कुछ कर्म है, वह दुःखरूप ही है -- ऐसा समझकर कोई शारीरिक क्लेशके भयसे उसका त्याग कर दे, तो वह राजस त्याग करके भी त्यागके फलको नहीं पाता।

रोमन में पढ़ें

duḥkham ity eva yat karma kāya-kleśha-bhayāt tyajet
sa kṛitvā rājasaṁ tyāgaṁ naiva tyāga-phalaṁ labhet

अध्याय 18 · मोक्षसंन्यासयोग
गीता 6.40 श्रीकृष्ण

पार्थ नैवेह नामुत्र विनाशस्तस्य विद्यते।
नहि कल्याणकृत्कश्चिद्दुर्गतिं तात गच्छति ॥

हिंदी अर्थहे पृथानन्दन ! उसका न तो इस लोकमें और न परलोकमें ही विनाश होता है; क्योंकि हे प्यारे ! कल्याणकारी काम करनेवाला कोई भी मनुष्य दुर्गतिको प्राप्त नहीं जाता।

रोमन में पढ़ें

śhrī bhagavān uvācha
pārtha naiveha nāmutra vināśhas tasya vidyate
na hi kalyāṇa-kṛit kaśhchid durgatiṁ tāta gachchhati

अध्याय 6 · ध्यानयोग
गीता 2.40 श्रीकृष्ण

नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते।
स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात् ॥

हिंदी अर्थमनुष्यलोकमें इस समबुद्धिरूप धर्मके आरम्भका नाश नहीं होता, इसके अनुष्ठानका उलटा फल भी नहीं होता और इसका थोड़ासा भी अनुष्ठान (जन्म-मरणरूप) महान् भयसे रक्षा कर लेता है।

रोमन में पढ़ें

nehābhikrama-nāśho ’sti pratyavāyo na vidyate
svalpam apyasya dharmasya trāyate mahato bhayāt

अध्याय 2 · सांख्ययोग

सभी दुविधाएँ देखें · जीवन-विषयों से गीता